महंगाई
दिल्ली में रहना कोई आम बात नहीं अगर आपको दिल्ली में रहना है और आपके पास यहाँ अपना घर अपना कारोबार न हो तो आपके लिए दिल्ली नगरी परेशानी का सबब बन सकता है. और इसकी वजह है महंगाई. दिल्ली में लोग महंगाई को ले कर काफी परेशां रहते हैं.आये दिन हमें सुनने को मिलता है की पेट्रोल की कीमत में वृद्धि हो गई,खाद्धानो की कीमतों में वृद्धि हो हो गई. और बाकि घरेलु सामानों की कीमतों में वृद्धि हो गई. लोगो की इनकम तो वही होता है लेकिन सामानों की कीमतों में वृद्धि हो जाती है. ऐसे में लोगो के लिए मुश्किल और बढ़ जाता है.कोई करे भी तो क्या करे, सर्कार भी तो कोई ध्यान नहीं देती या वो ध्यान दे भी तो कितना, अक्खिर कर नतीजा यही सामने आता है की आम जनता को ही इसका शिकार होना पड़ता है.
Friday, December 31, 2010
दिल्ली की सर्दी
यूँ तो दिल्ली की हर चीज़ निराली है. चाहे दिल्ली के लोग हो या दिल्ली के मेट्रो या दिल्ली के पकवान. इन सब चीज़ों के साथ साथ दिल्ली की सर्दी भी अनोखी है. दिल्ली माँ\इ जब सर्दी होने लगती है तो ऐसा लगता है. की हम कोसी हिल स्टेशन में रह रहे हों. दिल्ली में सर्दियाँ नवम्बर के अंत से होनो शुरू हो जाता है. और यह लग भाग जनवरी के अंत तक चलता है. दिल्ली में अधीक पोपुलेशन होने की वजह से यहाँ गर्मी के दिनों में अधिक गर्मी तथा सर्दी के दिनों में अधिक सर्दी पड़ती है. जनवरी के कुछ दिन तो यहाँ इतनी सर्दी पड़ती है के लोग घर से भी नहीं निकलना चाहते. लोग जगह जगह आग जला जला के बैठ जाते और घंटो आग के पास ही बैठे रहते हैं.जो लोग कामकाजी होते हैं वे भी ऑफिस में हीटर की व्वस्था रखते हैं. कुल मिला के देखि जाये तो दिल्ली की तरह यहाँ की ठण्ड भी अनोखी है.
यूँ तो दिल्ली की हर चीज़ निराली है. चाहे दिल्ली के लोग हो या दिल्ली के मेट्रो या दिल्ली के पकवान. इन सब चीज़ों के साथ साथ दिल्ली की सर्दी भी अनोखी है. दिल्ली माँ\इ जब सर्दी होने लगती है तो ऐसा लगता है. की हम कोसी हिल स्टेशन में रह रहे हों. दिल्ली में सर्दियाँ नवम्बर के अंत से होनो शुरू हो जाता है. और यह लग भाग जनवरी के अंत तक चलता है. दिल्ली में अधीक पोपुलेशन होने की वजह से यहाँ गर्मी के दिनों में अधिक गर्मी तथा सर्दी के दिनों में अधिक सर्दी पड़ती है. जनवरी के कुछ दिन तो यहाँ इतनी सर्दी पड़ती है के लोग घर से भी नहीं निकलना चाहते. लोग जगह जगह आग जला जला के बैठ जाते और घंटो आग के पास ही बैठे रहते हैं.जो लोग कामकाजी होते हैं वे भी ऑफिस में हीटर की व्वस्था रखते हैं. कुल मिला के देखि जाये तो दिल्ली की तरह यहाँ की ठण्ड भी अनोखी है.
Tuesday, December 28, 2010
दिल्ली में छात्रों की हालत
दिल्ली में शिक्षा के अधिक अवसर होने के नाते यहाँ लग भाग भारत के कई राज्य से लोग तालीम हासिल करने आते हैं| जिन छात्रों को यहाँ अच्छे इंस्टिट्यूट में एडमिशन मिल जाता है तथा उनको हॉस्टल मिल जाता है उनको तो ज्यादा परेशानी नहीं होती लेकिन जिन छात्रों को हॉस्टल नहीं मिल पता उनको यहाँ खासा परेशानी झेलनी पड़ती है| दिन भर स्कूल कॉलेज से थक कराते फिर खान बनाते है कपडे साफ करते हैं और होम वर्क पूरा करने लग जाते हैं| ऐसे में उनको टाइम ही नहीं मिल पता एक्स्ट्रा कुछ करने का|
दिल्ली में शिक्षा के अधिक अवसर होने के नाते यहाँ लग भाग भारत के कई राज्य से लोग तालीम हासिल करने आते हैं| जिन छात्रों को यहाँ अच्छे इंस्टिट्यूट में एडमिशन मिल जाता है तथा उनको हॉस्टल मिल जाता है उनको तो ज्यादा परेशानी नहीं होती लेकिन जिन छात्रों को हॉस्टल नहीं मिल पता उनको यहाँ खासा परेशानी झेलनी पड़ती है| दिन भर स्कूल कॉलेज से थक कराते फिर खान बनाते है कपडे साफ करते हैं और होम वर्क पूरा करने लग जाते हैं| ऐसे में उनको टाइम ही नहीं मिल पता एक्स्ट्रा कुछ करने का|
दिल्ली में बढ़ते छेड़ छाड़ की घटना
वेसे तो दिल्ली को दिलवालों का शहर कहा जाता है और इसमें लाखों सभ्भय लोग बसते हैं. लेकिन इनके साथ साथ कुछ असभ्भय लोग भी हैं जो दिल्ली को बदनाम करते है. अभी हाल के ही कुछ दिनों में दिल्ली में कई छेड़ छाड़ के मामले सामने आये! चाहे वो ऑटो वाले से सम्बंधित हो या या फिर दिल्ली के युवाओं से सम्बंधित, इनको मौका मिलते ही ये अपनी नीचता को दिखा ही देते हैं|
ऐसे मामले खास कर कॉल सेंटर की महिलाओं के साथ ज्यादा पेश अत है| ये महिलाएं भारत के राज्यों से यहाँ तालीम हासिल करने या जॉब के सिलसिले में आते हैं और कभी कभी जरा सी असावधानी से इनको अपनी इज्ज़त गवानी पड़ती है|
वेसे तो दिल्ली को दिलवालों का शहर कहा जाता है और इसमें लाखों सभ्भय लोग बसते हैं. लेकिन इनके साथ साथ कुछ असभ्भय लोग भी हैं जो दिल्ली को बदनाम करते है. अभी हाल के ही कुछ दिनों में दिल्ली में कई छेड़ छाड़ के मामले सामने आये! चाहे वो ऑटो वाले से सम्बंधित हो या या फिर दिल्ली के युवाओं से सम्बंधित, इनको मौका मिलते ही ये अपनी नीचता को दिखा ही देते हैं|
ऐसे मामले खास कर कॉल सेंटर की महिलाओं के साथ ज्यादा पेश अत है| ये महिलाएं भारत के राज्यों से यहाँ तालीम हासिल करने या जॉब के सिलसिले में आते हैं और कभी कभी जरा सी असावधानी से इनको अपनी इज्ज़त गवानी पड़ती है|
Monday, December 27, 2010
qutub minar
क़ुतुब मीनार
दिल्ली का क़ुतुब मीनार जो क़ुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाया गया था.कहा जाता है की जब क़ुतुबुद्दीन ऐबक भारत में विजय पाया तो उसने इसे बतौर जीत की निशानी बनाया. ये मीनार अपने आप में किसी सातवें अजूबे से कम नहीं है. आज के दौर में यह मीनार पत्थरों से बनी हुई दुनिया की सबसे ऊँची मीनार है.
क़ुतुब मीनार दिल्ली के मेहरुली में स्तिथ है. जिसको देखने दुनिया भर से सैलानी हजारो की संख्यां में आते है. जब भी कोई विदेशी पर्यटक दिल्ली अत है तो वह क़ुतुब मीनार जरुर जाता है.और उसे देखने के बाद उसकी पर्शंसा किये नहीं थकता. पर्यटकों के अलावा इसमें फिल्मों की शूटिंग टी वी सीरियल्स की शूटिंग द्वारा भारतीय पर्यटक विभाग को इससे करोरों का फायदा होता है.
क़ुतुब मीनार की बनावट ऐसी है के अज के युग में इसे बनाना लगभग नामुमकिन सा मालूम पड़ता है. इसकी बनावट बिलकुल गोल और शंकु आकार का है.जिसके अन्दर सीढियाँ बनी है.पहले यह सीढियाँ खुली हुआ करती थी लेकिन हल के कुछ दिनों से इसे बंद कर दिया गया है.
दिल्ली का क़ुतुब मीनार जो क़ुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाया गया था.कहा जाता है की जब क़ुतुबुद्दीन ऐबक भारत में विजय पाया तो उसने इसे बतौर जीत की निशानी बनाया. ये मीनार अपने आप में किसी सातवें अजूबे से कम नहीं है. आज के दौर में यह मीनार पत्थरों से बनी हुई दुनिया की सबसे ऊँची मीनार है.
क़ुतुब मीनार दिल्ली के मेहरुली में स्तिथ है. जिसको देखने दुनिया भर से सैलानी हजारो की संख्यां में आते है. जब भी कोई विदेशी पर्यटक दिल्ली अत है तो वह क़ुतुब मीनार जरुर जाता है.और उसे देखने के बाद उसकी पर्शंसा किये नहीं थकता. पर्यटकों के अलावा इसमें फिल्मों की शूटिंग टी वी सीरियल्स की शूटिंग द्वारा भारतीय पर्यटक विभाग को इससे करोरों का फायदा होता है.
क़ुतुब मीनार की बनावट ऐसी है के अज के युग में इसे बनाना लगभग नामुमकिन सा मालूम पड़ता है. इसकी बनावट बिलकुल गोल और शंकु आकार का है.जिसके अन्दर सीढियाँ बनी है.पहले यह सीढियाँ खुली हुआ करती थी लेकिन हल के कुछ दिनों से इसे बंद कर दिया गया है.
Tuesday, December 21, 2010
दिल्ली का नज़ारा
दिल्ली दुनिया भर की प्राचीनतम शहरों में से एक शहर है. जिसमे आपको दुनिया के तथा देश के भिन्न भिन्न प्रकार के लोग मिल जायेंगे.भिन्न भिन्न परम्परा के लोग मिल जायेंगे. दिल्ल्ली भारत के चारों महानगरों में से एक है.तथा यह भारत की राजधानी भी है. यह यमुना नदी के किनारे बसा हुवा एक प्राचीन शहर है.जिसमे लाखों की संख्या में लोग कार्यरत है.इन सब चीजों के साथ दिल्ली लोगों के आकर्षक का भी केंद्र है.दिल्ली में अगर हम टूरिस्ट स्थानों की बात करें तो यह इस मामले में भी बहुत आगे है. दिल्ली का क़ुतुब मीनार, इंडिया गेट चिडया घर लाल किला जैसी स्थान पर्यटन की शोभा को बढ़ाती है. दिल्ली के लोग भी बहुत एजुकेटेड और अडवांस होता है इसी लिए इस शहर को दिल वालों की नगरी कहा जाट है.
दिल्ली दुनिया भर की प्राचीनतम शहरों में से एक शहर है. जिसमे आपको दुनिया के तथा देश के भिन्न भिन्न प्रकार के लोग मिल जायेंगे.भिन्न भिन्न परम्परा के लोग मिल जायेंगे. दिल्ल्ली भारत के चारों महानगरों में से एक है.तथा यह भारत की राजधानी भी है. यह यमुना नदी के किनारे बसा हुवा एक प्राचीन शहर है.जिसमे लाखों की संख्या में लोग कार्यरत है.इन सब चीजों के साथ दिल्ली लोगों के आकर्षक का भी केंद्र है.दिल्ली में अगर हम टूरिस्ट स्थानों की बात करें तो यह इस मामले में भी बहुत आगे है. दिल्ली का क़ुतुब मीनार, इंडिया गेट चिडया घर लाल किला जैसी स्थान पर्यटन की शोभा को बढ़ाती है. दिल्ली के लोग भी बहुत एजुकेटेड और अडवांस होता है इसी लिए इस शहर को दिल वालों की नगरी कहा जाट है.
Monday, December 20, 2010
Sunday, December 19, 2010
अपनी आवाज को बनाएं पहचान
अगर आप अपनी आवाज से लोगों को दिवाना बनाना चाहते हैं तो रेडियो
जॉकी आपके लिए बिलकुल सही करियर
साबित
होगा। एफएम स्टेशनों की बढ़ती लोकप्रियता से युवाओं में आरजे बनने का क्रेज दिन
प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। वहीं भारत सरकार भी देश के विभिन्न हिस्सों में 5000
कम्युनिटी रेडियो स्थापित करना चाहती है जिससे युवाओं के लिए इस क्षेत्र में रोजगार
की पूरी संभावना है।
दिल्ली की मैट्रो रेल हो या
लोकल बसें हर जगह आपको कानों में हेड फोन लगा रेडियो सुनते युवा दिख ही जाएंगे।
मोबाइल की लोकप्रियता और उसमें रेडियो होने से हर वर्ग आजकल एफएम का दीवाना है।
एफएम के बढ़ते प्रचलन से युवाओं में अपनी आवाज दूसरे लोगों तक पहुंचाने की भी प्रबल
इच्छा है। आप भी कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं तो रेडियो जॉकी आपके लिए सही रास्ता है।
इसके लिए जरूरी है कि अच्छी आवाज के साथ ही आपको मनोरंजन करने की कला और लोगों से
कम्युनिकेशन करने की तरकीबें भी आनी चाहिए।
आरजे बनने के लिए कुछ जरुरी
गुण
अच्छी आवाज : आरजे बनने के लिए यूँ तो किसी खास
डिप्लोमा या डिग्री की जरूरत नहीं, बस आपके पास अच्छी आवाज होनी चाहिए। आरजे
मल्लिका बताती है कि इस क्षेत्र में केवल आप अपनी आवाज के जरिए दमदार पहचान बना
सकते हैं। आपको अपनी आवाज के कल्पनाशील इस्तेमाल और उसके उतार-चढ़ाव के जरिए लोगों
को प्रभावित करने की कला आनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि जिनकी आवाज पतली होती है वो
आरजे नहीं बन सकते। कोई भी अपनी आवाज में बदलाव ला सकता है। मैं भी अभी तक अपनी
आवाज पर काम कर रही हूं। कम्युनिटी रेडियो में काम करने का एक और फायदा है कि यहां
शब्दों की बाउंडेशन होती है। आम जिंदगी में बोले जाने वाले शब्द भी हम कम ही
इस्तेमाल करते हैं क्योंकि हमारे श्रोता ज्यादातर स्टूडेंट्स ही हैं। और अगर हम
बंदिश में रहकर बोलना सीख लेंगे तो आगे चलकर हमें कोई परेशानी नहीं
होगी।
भाषा और उच्चारण : हिन्दी व अंग्रेजी के साथ आपको
स्थानीय भाषा का ज्ञान भी होना चाहिए। आजकल रेडियो पर जिस भाषा का इस्तेमाल किया
जाता है वह ठीक हिंदी नहीं है। वह मिक्स भाषा है। उसमें हिन्दी के साथ अंग्रेजी तथा
अन्य बोलियों को शामिल किया जाता है। फिर उच्चारण सही और साफ होना
चाहिए।
जनरल अवेयरनेस : रेडियो सिर्फ गीत-संगीत सुनाने और
मनोरंजन करने भर का माध्यम ही नहीं रह गया है। इसके जरिए दुनिया जहान की
इन्फॉर्मेशंस और हलचलों की जानकारियाँ भी दी जाती हैं। इसलिए एक अच्छे आरजे में
जनरल अवेयरनेस होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि वह न्यूज चैनल्स के साथ ही तमाम
न्यूज पेपर्स और मैग्जीन्स को नियमित पढ़ता रहे और अपने को अपडेट
रखे।
हमेशा खुश : आरजे का कोई समय निश्चित नहीं होता है। उसे
प्रोग्राम प्रेजेंट करने के लिए कभी भी कॉल किया जा सकता है लिहाजा यह जरूरी है
चाहे वो उदास हो या कुछ और माइक्रोफोन पर उसे हमेशा खुश और एक जिंदादिल आरजे बनना
पड़ता है। क्योंकि सारा खेल ही आवाज का है लिहाजा आपकी आवाज ही आपके व्यक्तित्व का
आईना होती है।
ये हैं फिल्मी आरजे : खासी चर्चित और हिट फिल्म
लगे रहो मुन्नाभाई में अभिनेत्री विद्या बालन की अदा और आवाज के खास उतार-चढ़ाव के
जरिए बोलती हैं-गुड मॉर्निंग मुंबई कि मुन्नाभाई की तरह अक्खा मुंबई फ्लैट हो जाता
है। फिल्म नमस्ते लंदन में प्रिटी जिंटा मजेदार शो प्रेजेंट करती हैं और स्टेशन की
स्टार आरजे बन जाती हैं और अब तो आने वाली फिल्म रेडियो में गायक हिमेश रेशमिया भी
रेडियो जॉकी के रोल में दिखाई देंगे। कमीने फिल्म के प्रमोशन के लिए शाहिद कपूर से
लेकर विशाल भारद्वाज तक थोड़ी देर के लिए आरजे बन गए थे। यह दिल के दरवाजे खोलकर जी
भरकर बोलने का करियर है।
सेंस ऑफ ह्यूमर : बोरिंग एंकरिग या
होस्टिंग कौन पसंद करता है? लिहाजा अच्छे आरजे में सेंस ऑफ ह्यूमर का होना जरूरी
है। वह अपने प्रोग्राम को स्तरीय हास्य से मजेदार बना सकता है। इस तरह वह अपनी एक
यूएसपी बना सकता है।
फ्रेंडली : अच्छे आरजे बनने के लिए आप को
लोगों से कम्युनिकेशन करने के लिए फ्रेंडली होना होगा यानी ज्यादा स्वाभाविक,
ज्यादा अनौपचारिक और कोई भी बनावटीपन नहीं।
राइटिंग और प्रेजेंटिंग
स्किल्स : अच्छा आरजे अपनी स्क्रिप्ट भी खुद लिखता है। इसलिए अपने
प्रोग्राम या शो को दिलचस्प बनाने के लिए दिलचस्प अंदाज के साथ लिखना भी आना चाहिए
और लिखने के बाद उसे उतने ही चुटीले अंदाज के साथ प्रस्तुत करना भी आना
चाहिए।
म्यूजिक-लवर : कहने की जरूरत नहीं आरजे को म्यूजिक लवर
होना चाहिए। उसे न केवल बॉलीवुड के गीत-संगीत की अपडेट जानकारी होना चाहिए बल्कि
इंटरनेशनल म्यूजिक के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। कौन सी फिल्में आ रही हैं,
कौन से एलबम्स और कौन से गीत हिट हो रहे हैं, किस संगीतकार, गीतकार का अच्छा गीत
कौन सा है, इसकी जानकारी उसे अच्छा प्रेजेंटर बना सकती है।
कम्युनिकेशन
स्किल्स : आरजे को आम लोगों से लेकर सेलिब्रिटीज से बातचीत करना होती है
लिहाजा कम्युनिकेशन स्किल्स होना चाहिए, ताकि वह बात को बेहतर ढंग से कह
सके।
कम्युनिटी रेडियो से करें शुरुआत
दिल्ली युनिवर्सिटी
के कम्युनिटी रेडियो की स्टेशन हेड विजय लक्ष्मी बताती हैं कि जिन युवाओं को आरजे
के तौर पर अपनी पहचान बनानी है वो कम्युनिटी रेडियो से शुरुआत करें तो अच्छा हैं
क्योंकि यहां युवाओं को अपनी प्रतिभा को निखारने का भरपूर मौका दिया जाता है।
विद्यार्थी जो कोर्सेस करते हैं उनमें उनको प्रेक्टिकल ट्रेनिंग नहीं मिलती इसलिए
जरुरी है कि वो या तो किसी कम्युनिटी रेडियो में इंर्टनशिप करें या फिर वहां बतौर
ट्रेनी नौकरी भी कर सकते हैं। ऐसे स्थानों पर काम करने से उनमें हौंसला बढ़ता है
जिससे वो बड़े से बड़े प्रेशर को फेस करने के काबिल बनते है। उन्होंने बताया कि
भारत सरकार भी गांवों और शहरों में कम्युनिटी रेडियो की गिनती बढ़ाना चाहती है
जिससे उन्हें इस क्षेत्र में रोजगार ढूंढने में भी कोई परेशानी नहीं
होगी।
क्रिएटिव होना बेहद जरुरी
आरजे चिंतन बताती है कि
रेडियो पर आपको अपनी क्रिएटिविटी दिखानी होगी। स्क्रिप्ट से लेकर कार्यक्रम
प्रस्तुत करने में रचनात्मक होना चाहिए। इसके अलावा आरजे यदि कल्चरली एक्टिव होगा
तो वह ज्यादा बेहतर ढंग से चीजों को प्रस्तुत कर सकेगा। युवाओं की इस क्षेत्र में
सफलता का कारण भी है क्योंकि उनके पास जोश, नए विचार और नए कॉनसेप्ट होते हैं जो इस
क्षेत्र के लिए बहुत जरूरी हैं। इसलिए उन्होंने इस क्षेत्र को चुना ताकि वो अपनी
आवाज को दुनिया में फैला सके और काम को अपने तरीके से कर सके। चिंतन के मुताबिक अगर
आप बड़े रेडियो स्टेशन में काम करते हैं तो ये एक ग्लैमरस जॉब भी है। लोग आपको
जानते हैं आपको मिलते हैं ये काफी अच्छा लगता है।
जॉकी आपके लिए बिलकुल सही करियर
साबित होगा। एफएम स्टेशनों की बढ़ती लोकप्रियता से युवाओं में आरजे बनने का क्रेज दिन
प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। वहीं भारत सरकार भी देश के विभिन्न हिस्सों में 5000
कम्युनिटी रेडियो स्थापित करना चाहती है जिससे युवाओं के लिए इस क्षेत्र में रोजगार
की पूरी संभावना है।
दिल्ली की मैट्रो रेल हो या
लोकल बसें हर जगह आपको कानों में हेड फोन लगा रेडियो सुनते युवा दिख ही जाएंगे।
मोबाइल की लोकप्रियता और उसमें रेडियो होने से हर वर्ग आजकल एफएम का दीवाना है।
एफएम के बढ़ते प्रचलन से युवाओं में अपनी आवाज दूसरे लोगों तक पहुंचाने की भी प्रबल
इच्छा है। आप भी कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं तो रेडियो जॉकी आपके लिए सही रास्ता है।
इसके लिए जरूरी है कि अच्छी आवाज के साथ ही आपको मनोरंजन करने की कला और लोगों से
कम्युनिकेशन करने की तरकीबें भी आनी चाहिए।
आरजे बनने के लिए कुछ जरुरी
गुण
अच्छी आवाज : आरजे बनने के लिए यूँ तो किसी खास
डिप्लोमा या डिग्री की जरूरत नहीं, बस आपके पास अच्छी आवाज होनी चाहिए। आरजे
मल्लिका बताती है कि इस क्षेत्र में केवल आप अपनी आवाज के जरिए दमदार पहचान बना
सकते हैं। आपको अपनी आवाज के कल्पनाशील इस्तेमाल और उसके उतार-चढ़ाव के जरिए लोगों
को प्रभावित करने की कला आनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि जिनकी आवाज पतली होती है वो
आरजे नहीं बन सकते। कोई भी अपनी आवाज में बदलाव ला सकता है। मैं भी अभी तक अपनी
आवाज पर काम कर रही हूं। कम्युनिटी रेडियो में काम करने का एक और फायदा है कि यहां
शब्दों की बाउंडेशन होती है। आम जिंदगी में बोले जाने वाले शब्द भी हम कम ही
इस्तेमाल करते हैं क्योंकि हमारे श्रोता ज्यादातर स्टूडेंट्स ही हैं। और अगर हम
बंदिश में रहकर बोलना सीख लेंगे तो आगे चलकर हमें कोई परेशानी नहीं
होगी।
भाषा और उच्चारण : हिन्दी व अंग्रेजी के साथ आपको
स्थानीय भाषा का ज्ञान भी होना चाहिए। आजकल रेडियो पर जिस भाषा का इस्तेमाल किया
जाता है वह ठीक हिंदी नहीं है। वह मिक्स भाषा है। उसमें हिन्दी के साथ अंग्रेजी तथा
अन्य बोलियों को शामिल किया जाता है। फिर उच्चारण सही और साफ होना
चाहिए।
जनरल अवेयरनेस : रेडियो सिर्फ गीत-संगीत सुनाने और
मनोरंजन करने भर का माध्यम ही नहीं रह गया है। इसके जरिए दुनिया जहान की
इन्फॉर्मेशंस और हलचलों की जानकारियाँ भी दी जाती हैं। इसलिए एक अच्छे आरजे में
जनरल अवेयरनेस होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि वह न्यूज चैनल्स के साथ ही तमाम
न्यूज पेपर्स और मैग्जीन्स को नियमित पढ़ता रहे और अपने को अपडेट
रखे।
हमेशा खुश : आरजे का कोई समय निश्चित नहीं होता है। उसे
प्रोग्राम प्रेजेंट करने के लिए कभी भी कॉल किया जा सकता है लिहाजा यह जरूरी है
चाहे वो उदास हो या कुछ और माइक्रोफोन पर उसे हमेशा खुश और एक जिंदादिल आरजे बनना
पड़ता है। क्योंकि सारा खेल ही आवाज का है लिहाजा आपकी आवाज ही आपके व्यक्तित्व का
आईना होती है।
ये हैं फिल्मी आरजे : खासी चर्चित और हिट फिल्म
लगे रहो मुन्नाभाई में अभिनेत्री विद्या बालन की अदा और आवाज के खास उतार-चढ़ाव के
जरिए बोलती हैं-गुड मॉर्निंग मुंबई कि मुन्नाभाई की तरह अक्खा मुंबई फ्लैट हो जाता
है। फिल्म नमस्ते लंदन में प्रिटी जिंटा मजेदार शो प्रेजेंट करती हैं और स्टेशन की
स्टार आरजे बन जाती हैं और अब तो आने वाली फिल्म रेडियो में गायक हिमेश रेशमिया भी
रेडियो जॉकी के रोल में दिखाई देंगे। कमीने फिल्म के प्रमोशन के लिए शाहिद कपूर से
लेकर विशाल भारद्वाज तक थोड़ी देर के लिए आरजे बन गए थे। यह दिल के दरवाजे खोलकर जी
भरकर बोलने का करियर है।
सेंस ऑफ ह्यूमर : बोरिंग एंकरिग या
होस्टिंग कौन पसंद करता है? लिहाजा अच्छे आरजे में सेंस ऑफ ह्यूमर का होना जरूरी
है। वह अपने प्रोग्राम को स्तरीय हास्य से मजेदार बना सकता है। इस तरह वह अपनी एक
यूएसपी बना सकता है।
फ्रेंडली : अच्छे आरजे बनने के लिए आप को
लोगों से कम्युनिकेशन करने के लिए फ्रेंडली होना होगा यानी ज्यादा स्वाभाविक,
ज्यादा अनौपचारिक और कोई भी बनावटीपन नहीं।
राइटिंग और प्रेजेंटिंग
स्किल्स : अच्छा आरजे अपनी स्क्रिप्ट भी खुद लिखता है। इसलिए अपने
प्रोग्राम या शो को दिलचस्प बनाने के लिए दिलचस्प अंदाज के साथ लिखना भी आना चाहिए
और लिखने के बाद उसे उतने ही चुटीले अंदाज के साथ प्रस्तुत करना भी आना
चाहिए।
म्यूजिक-लवर : कहने की जरूरत नहीं आरजे को म्यूजिक लवर
होना चाहिए। उसे न केवल बॉलीवुड के गीत-संगीत की अपडेट जानकारी होना चाहिए बल्कि
इंटरनेशनल म्यूजिक के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। कौन सी फिल्में आ रही हैं,
कौन से एलबम्स और कौन से गीत हिट हो रहे हैं, किस संगीतकार, गीतकार का अच्छा गीत
कौन सा है, इसकी जानकारी उसे अच्छा प्रेजेंटर बना सकती है।
कम्युनिकेशन
स्किल्स : आरजे को आम लोगों से लेकर सेलिब्रिटीज से बातचीत करना होती है
लिहाजा कम्युनिकेशन स्किल्स होना चाहिए, ताकि वह बात को बेहतर ढंग से कह
सके।
कम्युनिटी रेडियो से करें शुरुआत
दिल्ली युनिवर्सिटी
के कम्युनिटी रेडियो की स्टेशन हेड विजय लक्ष्मी बताती हैं कि जिन युवाओं को आरजे
के तौर पर अपनी पहचान बनानी है वो कम्युनिटी रेडियो से शुरुआत करें तो अच्छा हैं
क्योंकि यहां युवाओं को अपनी प्रतिभा को निखारने का भरपूर मौका दिया जाता है।
विद्यार्थी जो कोर्सेस करते हैं उनमें उनको प्रेक्टिकल ट्रेनिंग नहीं मिलती इसलिए
जरुरी है कि वो या तो किसी कम्युनिटी रेडियो में इंर्टनशिप करें या फिर वहां बतौर
ट्रेनी नौकरी भी कर सकते हैं। ऐसे स्थानों पर काम करने से उनमें हौंसला बढ़ता है
जिससे वो बड़े से बड़े प्रेशर को फेस करने के काबिल बनते है। उन्होंने बताया कि
भारत सरकार भी गांवों और शहरों में कम्युनिटी रेडियो की गिनती बढ़ाना चाहती है
जिससे उन्हें इस क्षेत्र में रोजगार ढूंढने में भी कोई परेशानी नहीं
होगी।
क्रिएटिव होना बेहद जरुरी
आरजे चिंतन बताती है कि
रेडियो पर आपको अपनी क्रिएटिविटी दिखानी होगी। स्क्रिप्ट से लेकर कार्यक्रम
प्रस्तुत करने में रचनात्मक होना चाहिए। इसके अलावा आरजे यदि कल्चरली एक्टिव होगा
तो वह ज्यादा बेहतर ढंग से चीजों को प्रस्तुत कर सकेगा। युवाओं की इस क्षेत्र में
सफलता का कारण भी है क्योंकि उनके पास जोश, नए विचार और नए कॉनसेप्ट होते हैं जो इस
क्षेत्र के लिए बहुत जरूरी हैं। इसलिए उन्होंने इस क्षेत्र को चुना ताकि वो अपनी
आवाज को दुनिया में फैला सके और काम को अपने तरीके से कर सके। चिंतन के मुताबिक अगर
आप बड़े रेडियो स्टेशन में काम करते हैं तो ये एक ग्लैमरस जॉब भी है। लोग आपको
जानते हैं आपको मिलते हैं ये काफी अच्छा लगता है।
Friday, December 17, 2010
मोहब्बत अहसासों की पावन सी कहानी है...
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का, मैं
किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा...। समाज में प्रेम
को
लेकर हंगामा है लेकिन दिलों में बसे प्रेम को जगाने के लिए कुछ शब्द ही काफी हैं।
कुमार विश्वास के इन शब्दों का जादू लोगों की जुबान पर चढ़ा भी है
और जायका बदलने में भी सफल रहा है। आई हेट लव स्टोरीज के दौर में प्यार की लौ को
जलाने का काम करने वाले युवा कवि की एक कदम आगे के संवाददाता इमरान खान से हुई बातचीत के कुछ हिस्से।
दुनिया आपको पढऩे और सुनने की
शौकीन है, आजकल आप क्या पढ़ रहे हैं?
अपनी चेतना के शुरुआती दौर में
मैंने बहुत सी पुस्तकें पढ़ीं। हिंदी, अंग्रेजी साहित्य के अलावा मैंने बाईबल और
कुरान शरीफ भी पढ़ी है और अब भी पढ़ता हूं। पढ़ाई के दौरान एक स्थिति ऐसी आती है कि
वो उलझ जाता है उसको लगता है कि ये भी सही है, वो भी सही है। फिर वो धीरे-धीरे अपने
बारे में सोचना शुरू करता है। इन दिनों व्यस्तताओं की वजह से किताबें तो कम ही
पढ़ता हूं पर जब कोई नई किताब आती हैं तो जरूर पढ़ता हूं।
अब तक आपने जो
लिखा या पढ़ा है उससे कितना सतुंष्ट हैं?
एक प्रतिशत भी नहीं। मैं जो
भी लिखता हूं कुछ दिन बाद मुझे लगना शुरू हो जाता है कि इसमें वो मजा नहीं है। मुझे
देश के हर कोने से युवा कवि अपनी कविताएं भेजते हैं। नई पीढ़ी मुझ से काफी हद तक
जुड़ी है। अच्छी कविताओं का आना बाकी है। हो सकता है एक दिन मैं अच्छी कविता
लिखूं।
आपको क्या गाना अच्छा लगता है?
जो प्रस्तुति करने
वाले कवि हैं उनके साथ विडंबना ये है कि उन्हें क्या अच्छा लगता है उससे बड़ी बात
ये है कि श्रोता सुनना क्या चाहते हैं। मुझे नवगीत, पारंपरिक गीत अच्छे लगते हैं।
काफी हद तक मुझे पगली लड़की भी अच्छी लगती थी। एक बच्ची पर मैंने मधयंतिका नाम की
एक कविता लिखी थी, वो भी मुझे काफी पसंद है। एक तलाकशुदा महिला की 4 साल की बच्ची
मेरे साथ खेलने आती थी, जब मैं राजस्थान में पढ़ाता था। एक कविता मैंने कारगिल के
बाद लिखी थी वो भी मुझे काफी पसंद है। कुछ बातें लिखी नहीं जाती आसमान से उतरती हैं
जो दिल में घर कर जाती हैं।
आप किसी फिल्म में भी काम कर रहे
हैं?
हां, गोविंदा के साथ एक फिल्म की है चाय गर्म जिसमें मैं लीड रोल
में हूं। ये फिल्म जल्दी ही कंप्लीट होने वाली है।
क्या आज भी कुमार
विश्वास अपने आप को एक बच्चा ही समझते हैं?
लगभग आज भी मैं उसी तरह
महसूस करता हूं जैसा बीस साल पहले करता था। शायद इसलिए अपने आप को सेलीब्रिटी नहीं
मानता। बच्चों के साथ खेलने जाता हूं। बीवी के साथ बाजार भी जाता हूं। जिससे मैं
बाल कटवाता हूं उस के मोबाईल में मेरी आवाज की रिंगटोन है। उन्हें बहुत दिनों तक
पता ही नहीं चला कि मैं ही कुमार विश्वास हूं। ये गलत खबरें हैं कि मैं लोकप्रिय
हूं। लोकप्रियता एक ऐसी चीज है जो आपके साथ घटित तो होनी चाहिए पर आप उसमें घटित
नहीं होने चाहिए।
आजकल आपको धमकियां भी मिल रही हैं?
मेरी
टिप्पणियों के कारण मुझे जान से मार देने की धमकियां भी मिल रही हैं। कुछ दिन पहले
मैं मुंबई में बाल ठाकरे के खिलाफ बोल कर आया था तो भी मुझे बहुत धमकियां मिली। कुछ
कवियों को लगता है कि मेरी लोकप्रियता की वजह से उनका नुकसान हुआ है पर ऐसा होता
नहीं। किसी को मार देने से आपकी आयु नहीं बढ़ती।
आपके प्रिय कवि कौन है?
संस्कृत में कालीदास, हिन्दी में तो बहुत सारे कवि पसंद है। निराला
बहुत पसंद है। गीतकारों में गोपाल दास नीरज बहुत प्रिय हैं। उर्दू में गालिब का
बेइंतहा दीवाना हूं। नए शायरों में बशीर बद्र साहिब का लहज़ा और मुन्नवर राणा की
बेबाकी और खुद्दारी बहुत पसंद है।
आप अपने पहले प्रेम के बारे में कुछ
बताएं?
प्रेम मनुष्य की चेतना का अंश है। जिस दिन उसे अहसास होता है
कि मेरे अलावा भी दुनिया में कोई है। तब वो उसका आंकलन करना शुरू करता है और उस
प्रोसेस में उसको प्रेम हो जाता है। लोग सोचते हैं कि प्रेम में मिला क्या और खोया
क्या। प्रेम अपने आप में ही पूर्ण है। प्यार के किस्से तो व्यक्ति को अहसास करवाने
के लिए होते हैं। प्रेम करने के बाद लोग दुनिया को दूसरे नजरिए से देखना शुरू कर
देते हैं। दुनिया उसके सामने खुल जाती है। मैं ऐसा मानता हूं जिसने प्रेम नहीं किया
वो जिंदगी के वजूद से अछूता रह गया। उसकी स्थिति ठीक उस व्यक्ति जैसी है जो मंदिर
के बाहर खड़ी नंदी की मूर्ति को ही भगवान समझ कर लौट आया हो।
आजकल प्रेम
घटित तो हो रहा है पर उसे मान्यता क्यों नहीं मिल रही?
मनुष्य ने समाज
का निर्माण ही इसीलिए किया था ताकि वो अच्छा जीवन जी सके। वो अकेला डरता था। कुछ
वर्चस्ववादी लोग आगे आ आए हैं। दुर्भाग्य से ये ऐसा समय है जब सामाजिक नेतृत्व और
संस्कृति दोनों हाशिए पर हैं। ऐसा हर युग में हुआ है पर हर बार एक सोशल लीडर भी आया
है जिसने चीजों को सुधारा है। एक शेर है
कितने अवतार हुए कितने पैगंबर
आए
तू ना आया तेरे पैगाम बराबर आए।खुदाई पैगाम की तरह लोग आते रहते
हैं। पिछले 50-60 साल से हमारे पास कोई सोशल लीडर नहीं है। हमारे पास चमत्कार
दिखाने वाले बाबा तो बहुत है पर सही राह दिखाने वाला सोशल लीडर कोई नहीं है। जैसे
इन दिनों बाबा रामदेव जी को ये भ्रम हुआ है कि अगर लोग उनके योग के कारण, उनके भगवे
के कारण उनका सम्मान करते हैं तो इसके सहारे वो हिंदुस्तान की सत्ता पर कायम हो
जाएंगे। वो जिस राष्ट्र निर्माण की बात कर रहे हैं वो राष्ट्र निर्माण लिमिटेड
कंपनियों से नहीं होता, राष्ट्र निर्माण मंजन बेचने वाली दुकानों से नहीं होता।
उनमें और महात्मा गांधी में एक ही अंतर हैं कि गांधी के पीछे बिरला चलते थे और आजकल
के साधु बिरलाओं के पीछे चलते हैं। देश में सामाजिक नेतृत्व की कमी है जिस कारण ऐसा
हो रहा है।
आप ने किन देशों में कविताएं सुनाई हैं?अभी मैं
अमरीका और कनाडा गया था। 40 दिनों के दौरान मैंने वहां करीब 10 प्रोग्राम
किए।
कविता और गीत पढऩे के अंदाज से एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है? इससे
बारे में क्या कहेंगे?हां, शुरुआत तो है, पर अभी आप इसे अच्छी शुरुआत
नहीं मान सकते। ये तब संभव होगा जब इसी फार्मेट में 10-20 लोग और आएं। एक आदमी के
आने से ये नहीं माना जा सकता कि माहोल बदल गया। माहोल तो तब बदलेगा जब मेरे जैसे
प्रस्तुति करने वाले बहुत से कवि होंगे।
किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा...। समाज में प्रेम
को लेकर हंगामा है लेकिन दिलों में बसे प्रेम को जगाने के लिए कुछ शब्द ही काफी हैं।
कुमार विश्वास के इन शब्दों का जादू लोगों की जुबान पर चढ़ा भी है
और जायका बदलने में भी सफल रहा है। आई हेट लव स्टोरीज के दौर में प्यार की लौ को
जलाने का काम करने वाले युवा कवि की एक कदम आगे के संवाददाता इमरान खान से हुई बातचीत के कुछ हिस्से।
दुनिया आपको पढऩे और सुनने की
शौकीन है, आजकल आप क्या पढ़ रहे हैं?
अपनी चेतना के शुरुआती दौर में
मैंने बहुत सी पुस्तकें पढ़ीं। हिंदी, अंग्रेजी साहित्य के अलावा मैंने बाईबल और
कुरान शरीफ भी पढ़ी है और अब भी पढ़ता हूं। पढ़ाई के दौरान एक स्थिति ऐसी आती है कि
वो उलझ जाता है उसको लगता है कि ये भी सही है, वो भी सही है। फिर वो धीरे-धीरे अपने
बारे में सोचना शुरू करता है। इन दिनों व्यस्तताओं की वजह से किताबें तो कम ही
पढ़ता हूं पर जब कोई नई किताब आती हैं तो जरूर पढ़ता हूं।
अब तक आपने जो
लिखा या पढ़ा है उससे कितना सतुंष्ट हैं?
एक प्रतिशत भी नहीं। मैं जो
भी लिखता हूं कुछ दिन बाद मुझे लगना शुरू हो जाता है कि इसमें वो मजा नहीं है। मुझे
देश के हर कोने से युवा कवि अपनी कविताएं भेजते हैं। नई पीढ़ी मुझ से काफी हद तक
जुड़ी है। अच्छी कविताओं का आना बाकी है। हो सकता है एक दिन मैं अच्छी कविता
लिखूं।
आपको क्या गाना अच्छा लगता है?
जो प्रस्तुति करने
वाले कवि हैं उनके साथ विडंबना ये है कि उन्हें क्या अच्छा लगता है उससे बड़ी बात
ये है कि श्रोता सुनना क्या चाहते हैं। मुझे नवगीत, पारंपरिक गीत अच्छे लगते हैं।
काफी हद तक मुझे पगली लड़की भी अच्छी लगती थी। एक बच्ची पर मैंने मधयंतिका नाम की
एक कविता लिखी थी, वो भी मुझे काफी पसंद है। एक तलाकशुदा महिला की 4 साल की बच्ची
मेरे साथ खेलने आती थी, जब मैं राजस्थान में पढ़ाता था। एक कविता मैंने कारगिल के
बाद लिखी थी वो भी मुझे काफी पसंद है। कुछ बातें लिखी नहीं जाती आसमान से उतरती हैं
जो दिल में घर कर जाती हैं।
आप किसी फिल्म में भी काम कर रहे
हैं?
हां, गोविंदा के साथ एक फिल्म की है चाय गर्म जिसमें मैं लीड रोल
में हूं। ये फिल्म जल्दी ही कंप्लीट होने वाली है।
क्या आज भी कुमार
विश्वास अपने आप को एक बच्चा ही समझते हैं?
लगभग आज भी मैं उसी तरह
महसूस करता हूं जैसा बीस साल पहले करता था। शायद इसलिए अपने आप को सेलीब्रिटी नहीं
मानता। बच्चों के साथ खेलने जाता हूं। बीवी के साथ बाजार भी जाता हूं। जिससे मैं
बाल कटवाता हूं उस के मोबाईल में मेरी आवाज की रिंगटोन है। उन्हें बहुत दिनों तक
पता ही नहीं चला कि मैं ही कुमार विश्वास हूं। ये गलत खबरें हैं कि मैं लोकप्रिय
हूं। लोकप्रियता एक ऐसी चीज है जो आपके साथ घटित तो होनी चाहिए पर आप उसमें घटित
नहीं होने चाहिए।
आजकल आपको धमकियां भी मिल रही हैं?
मेरी
टिप्पणियों के कारण मुझे जान से मार देने की धमकियां भी मिल रही हैं। कुछ दिन पहले
मैं मुंबई में बाल ठाकरे के खिलाफ बोल कर आया था तो भी मुझे बहुत धमकियां मिली। कुछ
कवियों को लगता है कि मेरी लोकप्रियता की वजह से उनका नुकसान हुआ है पर ऐसा होता
नहीं। किसी को मार देने से आपकी आयु नहीं बढ़ती।
आपके प्रिय कवि कौन है?
संस्कृत में कालीदास, हिन्दी में तो बहुत सारे कवि पसंद है। निराला
बहुत पसंद है। गीतकारों में गोपाल दास नीरज बहुत प्रिय हैं। उर्दू में गालिब का
बेइंतहा दीवाना हूं। नए शायरों में बशीर बद्र साहिब का लहज़ा और मुन्नवर राणा की
बेबाकी और खुद्दारी बहुत पसंद है।
आप अपने पहले प्रेम के बारे में कुछ
बताएं?
प्रेम मनुष्य की चेतना का अंश है। जिस दिन उसे अहसास होता है
कि मेरे अलावा भी दुनिया में कोई है। तब वो उसका आंकलन करना शुरू करता है और उस
प्रोसेस में उसको प्रेम हो जाता है। लोग सोचते हैं कि प्रेम में मिला क्या और खोया
क्या। प्रेम अपने आप में ही पूर्ण है। प्यार के किस्से तो व्यक्ति को अहसास करवाने
के लिए होते हैं। प्रेम करने के बाद लोग दुनिया को दूसरे नजरिए से देखना शुरू कर
देते हैं। दुनिया उसके सामने खुल जाती है। मैं ऐसा मानता हूं जिसने प्रेम नहीं किया
वो जिंदगी के वजूद से अछूता रह गया। उसकी स्थिति ठीक उस व्यक्ति जैसी है जो मंदिर
के बाहर खड़ी नंदी की मूर्ति को ही भगवान समझ कर लौट आया हो।
आजकल प्रेम
घटित तो हो रहा है पर उसे मान्यता क्यों नहीं मिल रही?
मनुष्य ने समाज
का निर्माण ही इसीलिए किया था ताकि वो अच्छा जीवन जी सके। वो अकेला डरता था। कुछ
वर्चस्ववादी लोग आगे आ आए हैं। दुर्भाग्य से ये ऐसा समय है जब सामाजिक नेतृत्व और
संस्कृति दोनों हाशिए पर हैं। ऐसा हर युग में हुआ है पर हर बार एक सोशल लीडर भी आया
है जिसने चीजों को सुधारा है। एक शेर है
कितने अवतार हुए कितने पैगंबर
आए
तू ना आया तेरे पैगाम बराबर आए।खुदाई पैगाम की तरह लोग आते रहते
हैं। पिछले 50-60 साल से हमारे पास कोई सोशल लीडर नहीं है। हमारे पास चमत्कार
दिखाने वाले बाबा तो बहुत है पर सही राह दिखाने वाला सोशल लीडर कोई नहीं है। जैसे
इन दिनों बाबा रामदेव जी को ये भ्रम हुआ है कि अगर लोग उनके योग के कारण, उनके भगवे
के कारण उनका सम्मान करते हैं तो इसके सहारे वो हिंदुस्तान की सत्ता पर कायम हो
जाएंगे। वो जिस राष्ट्र निर्माण की बात कर रहे हैं वो राष्ट्र निर्माण लिमिटेड
कंपनियों से नहीं होता, राष्ट्र निर्माण मंजन बेचने वाली दुकानों से नहीं होता।
उनमें और महात्मा गांधी में एक ही अंतर हैं कि गांधी के पीछे बिरला चलते थे और आजकल
के साधु बिरलाओं के पीछे चलते हैं। देश में सामाजिक नेतृत्व की कमी है जिस कारण ऐसा
हो रहा है।
आप ने किन देशों में कविताएं सुनाई हैं?अभी मैं
अमरीका और कनाडा गया था। 40 दिनों के दौरान मैंने वहां करीब 10 प्रोग्राम
किए।
कविता और गीत पढऩे के अंदाज से एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है? इससे
बारे में क्या कहेंगे?हां, शुरुआत तो है, पर अभी आप इसे अच्छी शुरुआत
नहीं मान सकते। ये तब संभव होगा जब इसी फार्मेट में 10-20 लोग और आएं। एक आदमी के
आने से ये नहीं माना जा सकता कि माहोल बदल गया। माहोल तो तब बदलेगा जब मेरे जैसे
प्रस्तुति करने वाले बहुत से कवि होंगे।
Wednesday, December 15, 2010
फुटबॉल को मिल ही गया नया चैंपियन
फुटबाल वल्ड कप
2010
का रोमांच बहुत सी यादों के साथ खत्म हो गया। स्पेन ने हालैंड को 1-0 से हराकर
फुटबाल वल्र्ड कप 2010 अपने नाम किया। स्पेन जहां पहली बार फाइनल में पहुंचा था
वहीं हालैंड 1974 और 78 के फाइनल में भी हार का सामना कर चुका है। फुटबाल की दुनिया
में विश्व विजेता का ताज पहनने वाली स्पेन आठवीं टीम है और पहली ऐसी टीम है जो यूरो
चैंपियन होने के साथ विश्व विजेता बनने में भी सफल रही। इसके अलावा स्पेन ऐसी पहली
टीम है जिसने अपना पहला मैच हारने के बाद विश्व कप का खिताब जीता हो। स्पेन की इस
जीत केसाथ ही आक्टोपस पाल की इस विश्व कप की आखरी भविष्यवाणी भी सही साबित हुई। इन
दोनों देशों के फाइनल में पहुंचने के बाद से ही यह तय था कि इस बार फुटबाल को नया
चैंपियन मिलने वाला है। दोनों टीमें निर्धारित समय तक कोई गोल नहीं कर पाईं।
एक्स्ट्रा टाइम के आखरी समय में स्पेन के आंद्रेस इनियेस्टा ने गोल दाग कर अपनी टीम
की जीत सुनिश्चित की। पिछले कई सालों से बेहतर फुटबाल खेल रहे स्पेन ने अपने देश को
खुशी मनाने का एक बड़ा मौका दिया। फुटबाल का समापन समारोह भी भव्य रहा। नेल्सन
मंडेला और शकीरा इसके आकर्षण का केंद्र रहे। रंगभेद के खिलाफ जंग लडऩे वाले मंडेला
महज चंद मिनटों के लिए साकर सिटी स्टेडियम पहुंचे। इसी के साथ पिछले लगभग एक महीने
से पूरे अफ्रीका और खासतौर से दक्षिण अफ्रीका में जारी फुटबाल का बुखार भी थम
जाएगा। शोर के आदी हो चुके कान अब शायद इसके लिए तरस जाएं। फुटबाल का अगला महाकुंभ
फुटबाल के जोगा बोनिता यानि सुंदर और प्रवाहमय सांबा फुटबाल के देश ब्राजील में
होगा। शकीरा ने लाइट शो और आतिशबाजी के बाद अपना जलवा बिखेरा। उन्होंने उदघाटन
समारोह में विश्व कप के गीत वाका-वाका से दर्शकों का मन मोह लिया और समापन समारोह
में भी उन्होंने इस गीत पर लोगों को थिरकने के लिए मजबूर कर दिया। उनके इलावा
ग्रेमी पुरस्कार विजेता कापेला समूह की लेडीस्मिथ ब्लैक माम्जो भी समापन समारोह की
आकर्षण रहीं। इस समारोह में अफ्रीका के कई देशों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा
लिया। दक्षिण अफ्रीका में जब 19वां फीफा विश्व कप शुरू हुआ तो माना जा रहा था कि
वायने रूनी, क्रिस्टियानो रोनाल्डो, लियोनेल मेसी और काका जैसे दिग्गज फुटबालर इस
महाकुंभ के महानायक बनकर उभरेंगे। लेकिन आखिर में कोई खिलाड़ी नहीं बल्कि सुदूर
जर्मनी के ओबेरहासेन शहर में एक छोटे से टैंक में कैद आठ पैरों वाला आक्टोपस पॉल सब
पर भारी पड़ा। अपनी भविष्यवाणियों के कारण पाल बाबा, संत पाल और पंडित पाल बने
आक्टोपस ने यूं तो लीग चरण से ही जर्मनी के मैचों के विजेता के बारे में बताना शुरू
कर दिया था लेकिन नाकआट चरण में उन्हें ज्यादा लोकप्रियता है।
2010 का रोमांच बहुत सी यादों के साथ खत्म हो गया। स्पेन ने हालैंड को 1-0 से हराकर
फुटबाल वल्र्ड कप 2010 अपने नाम किया। स्पेन जहां पहली बार फाइनल में पहुंचा था
वहीं हालैंड 1974 और 78 के फाइनल में भी हार का सामना कर चुका है। फुटबाल की दुनिया
में विश्व विजेता का ताज पहनने वाली स्पेन आठवीं टीम है और पहली ऐसी टीम है जो यूरो
चैंपियन होने के साथ विश्व विजेता बनने में भी सफल रही। इसके अलावा स्पेन ऐसी पहली
टीम है जिसने अपना पहला मैच हारने के बाद विश्व कप का खिताब जीता हो। स्पेन की इस
जीत केसाथ ही आक्टोपस पाल की इस विश्व कप की आखरी भविष्यवाणी भी सही साबित हुई। इन
दोनों देशों के फाइनल में पहुंचने के बाद से ही यह तय था कि इस बार फुटबाल को नया
चैंपियन मिलने वाला है। दोनों टीमें निर्धारित समय तक कोई गोल नहीं कर पाईं।
एक्स्ट्रा टाइम के आखरी समय में स्पेन के आंद्रेस इनियेस्टा ने गोल दाग कर अपनी टीम
की जीत सुनिश्चित की। पिछले कई सालों से बेहतर फुटबाल खेल रहे स्पेन ने अपने देश को
खुशी मनाने का एक बड़ा मौका दिया। फुटबाल का समापन समारोह भी भव्य रहा। नेल्सन
मंडेला और शकीरा इसके आकर्षण का केंद्र रहे। रंगभेद के खिलाफ जंग लडऩे वाले मंडेला
महज चंद मिनटों के लिए साकर सिटी स्टेडियम पहुंचे। इसी के साथ पिछले लगभग एक महीने
से पूरे अफ्रीका और खासतौर से दक्षिण अफ्रीका में जारी फुटबाल का बुखार भी थम
जाएगा। शोर के आदी हो चुके कान अब शायद इसके लिए तरस जाएं। फुटबाल का अगला महाकुंभ
फुटबाल के जोगा बोनिता यानि सुंदर और प्रवाहमय सांबा फुटबाल के देश ब्राजील में
होगा। शकीरा ने लाइट शो और आतिशबाजी के बाद अपना जलवा बिखेरा। उन्होंने उदघाटन
समारोह में विश्व कप के गीत वाका-वाका से दर्शकों का मन मोह लिया और समापन समारोह
में भी उन्होंने इस गीत पर लोगों को थिरकने के लिए मजबूर कर दिया। उनके इलावा
ग्रेमी पुरस्कार विजेता कापेला समूह की लेडीस्मिथ ब्लैक माम्जो भी समापन समारोह की
आकर्षण रहीं। इस समारोह में अफ्रीका के कई देशों के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा
लिया। दक्षिण अफ्रीका में जब 19वां फीफा विश्व कप शुरू हुआ तो माना जा रहा था कि
वायने रूनी, क्रिस्टियानो रोनाल्डो, लियोनेल मेसी और काका जैसे दिग्गज फुटबालर इस
महाकुंभ के महानायक बनकर उभरेंगे। लेकिन आखिर में कोई खिलाड़ी नहीं बल्कि सुदूर
जर्मनी के ओबेरहासेन शहर में एक छोटे से टैंक में कैद आठ पैरों वाला आक्टोपस पॉल सब
पर भारी पड़ा। अपनी भविष्यवाणियों के कारण पाल बाबा, संत पाल और पंडित पाल बने
आक्टोपस ने यूं तो लीग चरण से ही जर्मनी के मैचों के विजेता के बारे में बताना शुरू
कर दिया था लेकिन नाकआट चरण में उन्हें ज्यादा लोकप्रियता है।
कौन है ऑक्टोपस ऑक्टोपस ऑक्टोपस
का जन्म ब्रिटेन में हुआ है। इसके मालिक का कहना है कि इसने 2008 में यूरोपीय
चैंपियनशिप के दौरान भी 70 फीसदी सही भविष्यवाणी की थी। कुछ ज्योतिषियों की भी राय
है कि ऑक्टोपस में ताकत है और प्रकृति की ताकत से सब संभव है। इसलिए यह ऑक्टोपस जो
भविष्यवाणी कर रहा है, उसके सच होने की संभावना काफी ज्यादा है।
शकीरा
का जलवा भी रहा वल्र्ड कप के दौरान शकीरा ने लोगों का खूब मनोरंजन किया।
फुटबाल के लिए गाए गाने 'वाका-वाका दिस टाइम फॉर साउथ अफ्रीका' लोगों की जबान पर
चढ़ गया और शायद तब तक रहेगा जब तक शकीरा अपने चाहने वालों को कोई नया गाना नहीं
देती।कौन है आंद्रेस इनियेस्टा 116वें मिनट में
जैसे ही आंद्रेस इनयेस्टा ने स्पेन के लिए गोल दागा। उसी समय से लगभग स्पेन की जीत
तय हो गई थी। उसके बाद स्पेन के हीरो बनकर उभरे इनियेस्टा ही खबरों में छाए रहे।
आंद्रेस के इसी हैरतअंगेज गोल के बूते पर स्पेन ने जीत को भी पाया। 11 मई 1984 को
स्पेन में पैदा हुए आंद्रेस इनियेस्टा में बचपन से ही फुटबाल का एक अच्छा खिलाड़ी
होने के लगभग सभी गुण थे। इनियेस्टा ने अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच 27 मई 2006 को
रशिया के खिलाफ खेला था। ये स्पेन की टीम में मिड फिल्डर के तौर पर जुड़े थे।
इनियेस्टा अभी स्पेन के बरसेलोना कल्ब से जुड़े हैं और 2014 तक इसी कल्ब के लिए
खेलेंगे। इनियेस्टा मैदान में किसी भी जगह खेलने का माद्दा रखते हैं और उनके कोच
उन्हें मैदान में मिड फिल्डर की जिम्मेदारी सौंपी है। इनियेस्टा के इसी गोल के लिए
उन्हें मैन ऑफ द मैच का खिताब भी दिया गया। इस जीत के बात इनियेस्टा जब अपने देश
स्पेन पहुंचे तो लोगों ने उनका बड़ी ही गर्मजोशी के साथ स्वागत किया।
का जन्म ब्रिटेन में हुआ है। इसके मालिक का कहना है कि इसने 2008 में यूरोपीय
चैंपियनशिप के दौरान भी 70 फीसदी सही भविष्यवाणी की थी। कुछ ज्योतिषियों की भी राय
है कि ऑक्टोपस में ताकत है और प्रकृति की ताकत से सब संभव है। इसलिए यह ऑक्टोपस जो
भविष्यवाणी कर रहा है, उसके सच होने की संभावना काफी ज्यादा है।
शकीरा
का जलवा भी रहा वल्र्ड कप के दौरान शकीरा ने लोगों का खूब मनोरंजन किया।
फुटबाल के लिए गाए गाने 'वाका-वाका दिस टाइम फॉर साउथ अफ्रीका' लोगों की जबान पर
चढ़ गया और शायद तब तक रहेगा जब तक शकीरा अपने चाहने वालों को कोई नया गाना नहीं
देती।कौन है आंद्रेस इनियेस्टा 116वें मिनट में
जैसे ही आंद्रेस इनयेस्टा ने स्पेन के लिए गोल दागा। उसी समय से लगभग स्पेन की जीत
तय हो गई थी। उसके बाद स्पेन के हीरो बनकर उभरे इनियेस्टा ही खबरों में छाए रहे।
आंद्रेस के इसी हैरतअंगेज गोल के बूते पर स्पेन ने जीत को भी पाया। 11 मई 1984 को
स्पेन में पैदा हुए आंद्रेस इनियेस्टा में बचपन से ही फुटबाल का एक अच्छा खिलाड़ी
होने के लगभग सभी गुण थे। इनियेस्टा ने अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच 27 मई 2006 को
रशिया के खिलाफ खेला था। ये स्पेन की टीम में मिड फिल्डर के तौर पर जुड़े थे।
इनियेस्टा अभी स्पेन के बरसेलोना कल्ब से जुड़े हैं और 2014 तक इसी कल्ब के लिए
खेलेंगे। इनियेस्टा मैदान में किसी भी जगह खेलने का माद्दा रखते हैं और उनके कोच
उन्हें मैदान में मिड फिल्डर की जिम्मेदारी सौंपी है। इनियेस्टा के इसी गोल के लिए
उन्हें मैन ऑफ द मैच का खिताब भी दिया गया। इस जीत के बात इनियेस्टा जब अपने देश
स्पेन पहुंचे तो लोगों ने उनका बड़ी ही गर्मजोशी के साथ स्वागत किया।
Monday, December 13, 2010
सरेराह चलते-चलते
वसुं
धरा
(गाजियाबाद) से आनंद विहार (दिल्ली) तक का सफर कहने को करीब चार किलोमीटर का ही है।
जो तेज रफ्तार मोटरसाइकिल या कार से 10 से 15 मिनट में तय किया जा सकता है पर उस
इंसान को किन मुश्किलों से गुजरना पड़ता है होगा जिसके पास इन दोनों साधनों में से
कोई नहीं होगा। इसका अंदाजा मुझे उस वक्त हुआ जब मैंने वसुंधरा से आनंद विहार पहली
बार गया। लोगों ने मुझे वहां पहुंचने के दो रास्ते बताए। पहला यह कि आप ऑटो बुक कर
लें जो सिर्फ आपको आनंद विहार तक ले जाएगा। अगर आप इस रास्ते पर रोजाना सफर करना
चाहते हैं तो आपको दूसरा रास्ता ही अपनाना पड़ेगा। वो है शेयरिंग ऑटो का। वसुंधरा
से आनंद विहार को जाने वाली लोकल बसें समय-समय पर ही चलती हैं इसलिए आपको शेयरिंग
ऑटो का ही सहारा लेना पड़ेगा। आसपास खड़े तीन-चार लोगों के साथ मैं भी शेयरिंग ऑटों
का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर में एक ऑटो आया भी पर उसमें भीड़ और गर्मी का अंदाजा
लगाते हुए मैंने उसमें ना बैठना ही ठीक समझा। मेरे साथ खड़े बाकी लोग उसमें बैठ कर
जा चुके थे। थोड़ी देर में एक और ऑटो आया जिसमें सिर्फ एक ही सवारी थी। शायद ऑटो
वाले को कुछ जल्दी थी सो उसने रफ्तार कम की और मुझे चलते ऑटो में ही चढऩा पड़ा। ऑटो
में सिर्फ दो ही आदमी थे। ऑटो वाला और सवारियां बैठाना चाहता था जिससे उसने ऑटो की
रफ्तार थोड़ी कम कर दी। दूर से जब कोई सवारी आती दिखती तो वो रुक जाता। हैरानी उस
वक्त होती जब वो पास आकर ना में सिर हिलाता। चार किलोमीटर के रास्ते में ऐसा कई बार
हुआ। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुछ सवारियां ऑटो में बैठीं भी। एक समय ऑटो में दोनो तरफ
तीन-तीन सवारियां थी। इसके बाद जब-जब ऑटो रुकता तो सामने खड़ा व्यक्ति पहले सोचता
बैठूं या ना बैठूं। एक बार ऑटो वाला खुद उतर कर सवारियों को सैट करने लगा। उस वक्त
मेरी समझ आया कि ऑटो वाले अपने साथ एक और व्यक्ति क्यों रखते हैं। एक तरफ अब तीन और
दूसरी ओर चार सवारियां थीं। ऑटो फिर रुका अबकी बार सामने खड़ी थी 20-21 साल की
लड़की। पहले तो वो सोचती रही कि बैठूं कि ना बैठूं। फिर हिम्मत करके ऑटो में चढ़ी।
वहां बैठे तीन पुरुष अपनी जगहों से थोड़ा भी नहीं सरके। उसके बाद वो नीचे उतर गई।
उसके बाद ऑटो वाले ने खुद आकर उनको थोड़ा-थोड़ा सरकाया तब वो लड़की ऑटो में बैठ
सकी। फिर भी उन तीन 'महान' पुरुषों ने उसको उतनी ही जगह दी जिसमें वो
अपने आप को किसी तरह गिरने से बचा सके। कुछ दूरी पर एक सवारी ऑटो से उतर गई। ऑटो
चालक फिर एक सवारी की तलाश में नजरें इधर-उधर दौड़ाने लगा। फिर ऑटो रुका, अब सामने
खड़ा था 50-55 साल का बुर्जुग। फिर वही सबकुछ। अबकी बार तो वो लड़की भी एक इंच नहीं
सरकी। जिससे वो बुजुर्ग थोड़ा ठीक से बैठ सकता। दुनिया कितनी स्वार्थी है यही
सोचते-सोचते कुछ सफर और कटा। ऑटो जब खस्ताहाल सड़कों से गुजरता तो सवारियां बहुत
मुश्किल से अपने आप को गिरने से बचा पातीं। गाजियाबाद, एनसीआर का एक बड़ा हिस्सा है
पर वहां आम आदमी की जिंदगी कैसी है वो मैंने छोटे से सफर में ही महसूस किया।
दिल्ली-एनसीआर में अगर आपके पास नीजि वाहन नहीं है तो ऐसा घटनाक्रम आपके साथ रोज
घटेगा। ऑटो चालक की भाषा भी अपने आप में मिसाल थी। वो सवारियों से ऐसे बात करते
जैसे वो जेलर हो और सवारियां कैदी। इतना रुखापन, फिर भी सवारियों में कोई
प्रतिक्रिया नहीं। शायद सवारियां उनसे अच्छी तरह वाकिफ हो चुकी थीं। यही
सोचते-सोचते 'छोटा-सा' सफर खत्म हुआ। जैसे ही उतर कर ऑटो वाले को पैसे
देकर जाने लगा तो देखा लगभग सभी ऑटो में यही नजारा था।
धरा (गाजियाबाद) से आनंद विहार (दिल्ली) तक का सफर कहने को करीब चार किलोमीटर का ही है।
जो तेज रफ्तार मोटरसाइकिल या कार से 10 से 15 मिनट में तय किया जा सकता है पर उस
इंसान को किन मुश्किलों से गुजरना पड़ता है होगा जिसके पास इन दोनों साधनों में से
कोई नहीं होगा। इसका अंदाजा मुझे उस वक्त हुआ जब मैंने वसुंधरा से आनंद विहार पहली
बार गया। लोगों ने मुझे वहां पहुंचने के दो रास्ते बताए। पहला यह कि आप ऑटो बुक कर
लें जो सिर्फ आपको आनंद विहार तक ले जाएगा। अगर आप इस रास्ते पर रोजाना सफर करना
चाहते हैं तो आपको दूसरा रास्ता ही अपनाना पड़ेगा। वो है शेयरिंग ऑटो का। वसुंधरा
से आनंद विहार को जाने वाली लोकल बसें समय-समय पर ही चलती हैं इसलिए आपको शेयरिंग
ऑटो का ही सहारा लेना पड़ेगा। आसपास खड़े तीन-चार लोगों के साथ मैं भी शेयरिंग ऑटों
का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर में एक ऑटो आया भी पर उसमें भीड़ और गर्मी का अंदाजा
लगाते हुए मैंने उसमें ना बैठना ही ठीक समझा। मेरे साथ खड़े बाकी लोग उसमें बैठ कर
जा चुके थे। थोड़ी देर में एक और ऑटो आया जिसमें सिर्फ एक ही सवारी थी। शायद ऑटो
वाले को कुछ जल्दी थी सो उसने रफ्तार कम की और मुझे चलते ऑटो में ही चढऩा पड़ा। ऑटो
में सिर्फ दो ही आदमी थे। ऑटो वाला और सवारियां बैठाना चाहता था जिससे उसने ऑटो की
रफ्तार थोड़ी कम कर दी। दूर से जब कोई सवारी आती दिखती तो वो रुक जाता। हैरानी उस
वक्त होती जब वो पास आकर ना में सिर हिलाता। चार किलोमीटर के रास्ते में ऐसा कई बार
हुआ। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुछ सवारियां ऑटो में बैठीं भी। एक समय ऑटो में दोनो तरफ
तीन-तीन सवारियां थी। इसके बाद जब-जब ऑटो रुकता तो सामने खड़ा व्यक्ति पहले सोचता
बैठूं या ना बैठूं। एक बार ऑटो वाला खुद उतर कर सवारियों को सैट करने लगा। उस वक्त
मेरी समझ आया कि ऑटो वाले अपने साथ एक और व्यक्ति क्यों रखते हैं। एक तरफ अब तीन और
दूसरी ओर चार सवारियां थीं। ऑटो फिर रुका अबकी बार सामने खड़ी थी 20-21 साल की
लड़की। पहले तो वो सोचती रही कि बैठूं कि ना बैठूं। फिर हिम्मत करके ऑटो में चढ़ी।
वहां बैठे तीन पुरुष अपनी जगहों से थोड़ा भी नहीं सरके। उसके बाद वो नीचे उतर गई।
उसके बाद ऑटो वाले ने खुद आकर उनको थोड़ा-थोड़ा सरकाया तब वो लड़की ऑटो में बैठ
सकी। फिर भी उन तीन 'महान' पुरुषों ने उसको उतनी ही जगह दी जिसमें वो
अपने आप को किसी तरह गिरने से बचा सके। कुछ दूरी पर एक सवारी ऑटो से उतर गई। ऑटो
चालक फिर एक सवारी की तलाश में नजरें इधर-उधर दौड़ाने लगा। फिर ऑटो रुका, अब सामने
खड़ा था 50-55 साल का बुर्जुग। फिर वही सबकुछ। अबकी बार तो वो लड़की भी एक इंच नहीं
सरकी। जिससे वो बुजुर्ग थोड़ा ठीक से बैठ सकता। दुनिया कितनी स्वार्थी है यही
सोचते-सोचते कुछ सफर और कटा। ऑटो जब खस्ताहाल सड़कों से गुजरता तो सवारियां बहुत
मुश्किल से अपने आप को गिरने से बचा पातीं। गाजियाबाद, एनसीआर का एक बड़ा हिस्सा है
पर वहां आम आदमी की जिंदगी कैसी है वो मैंने छोटे से सफर में ही महसूस किया।
दिल्ली-एनसीआर में अगर आपके पास नीजि वाहन नहीं है तो ऐसा घटनाक्रम आपके साथ रोज
घटेगा। ऑटो चालक की भाषा भी अपने आप में मिसाल थी। वो सवारियों से ऐसे बात करते
जैसे वो जेलर हो और सवारियां कैदी। इतना रुखापन, फिर भी सवारियों में कोई
प्रतिक्रिया नहीं। शायद सवारियां उनसे अच्छी तरह वाकिफ हो चुकी थीं। यही
सोचते-सोचते 'छोटा-सा' सफर खत्म हुआ। जैसे ही उतर कर ऑटो वाले को पैसे
देकर जाने लगा तो देखा लगभग सभी ऑटो में यही नजारा था।
Saturday, December 11, 2010
Thursday, December 9, 2010
अपनी भाषा को ना भूलें
कॅरियर को लेकर आज के युवाओं में जितनी सर्तकता है उतना
ही असमंजस भी। तमाम विकल्पों में से किसी एक को चुनने की कवायद में कई तरह के सवाल
उठना लाज़मी है। ऐसे ही कुछ सवालों को लेकर इमरान खान ने चर्चा की
सीबीआई के पूर्व निदेशक और जाने-माने कॅरियर काउंसलर जोगिंदर सिंह
से। पेश है बातचीत के कुछ खास अंश।
अभी-अभी हम
मंदी
के दौर से गुजरे हैं जिसके कारण युवाओं ने भारी संख्या में नौकरियां गवाईं हैं। उन
युवाओं के सामने क्या चुनौतियां हैं?
मैं युवाओं को यही कहना
चाहूंगा कि जो हुआ उसे भूल कर नईं शुरुआत करें। काम चाहे कोई भी हो पूरी मेहनत और
शिद्दत के साथ करें क्योंकि जितना गुड़ डालो मीठा उतना ही होता है। काम को काम समझ
कर करें, सिर्फ छोटा-बड़ा समझ कर किसी काम को छोडऩा ठीक नहीं। मेहनत से काम करें
सफलता जरूर मिलेगी।
ग्रेडिंग सिस्टम शुरू होने के कारण कोई फेल नहीं हुआ
जिससे आत्महत्याएं बंद हो गई, यह तो ठीक है पर भविष्य में ग्रेडिंग सिस्टम कितना
प्रभावशाली रहेगा?यह सच है कि ग्रेडिंग सिस्टम से कोई फेल नहीं हुआ।
ग्रेड चाहे कोई भी हो सभी पास हुए हैं। युवाओं के लिए ये तो शुरुआत है। कम्पीटीशन
तो वह 12वीं की परीक्षा के बाद फेस करेंगे। अगर उन्होंने बिना पढ़ाई किए कम ग्रेड
में परीक्षा पास कर भी ली तो उसका कोई फायदा नहीं क्योंकि जब वो कम्पीटीशन एग्जाम
में बैठेंगे तो उन्हें अपनी काबलीयत का पता चलेगा। फिर उनके पास कोई रास्ता नहीं
बचेगा। इसलिए ठीक तो यही होगा कि अच्छी तरह पढ़ाई करें और अच्छे ग्रेड लेकर ही आगे
बढ़े ताकि आपके भविष्य की राह आसान हो सके।
प्रोफैशनल कोर्स करने के बाद
भी जिन युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही उन्हें क्या करना चाहिए?बिजनैस
करें। अगर प्रोफैशनल कोर्स करने के बाद नौकरी नहीं मिल रही तो सारी उमर इसका रोना
रोने से भी कोई फायदा नहीं। अच्छा यही होगा कि वह अपना खुद का बिजनैस शुरू करें और
अपने साथ-साथ दूसरों को भी रोजगार दें। शुरुआत सब छोटे से ही करते हैं, इसलिए चाहे
छोटा ही हो अपना बिजनैस ही करें।
ही असमंजस भी। तमाम विकल्पों में से किसी एक को चुनने की कवायद में कई तरह के सवाल
उठना लाज़मी है। ऐसे ही कुछ सवालों को लेकर इमरान खान ने चर्चा की
सीबीआई के पूर्व निदेशक और जाने-माने कॅरियर काउंसलर जोगिंदर सिंह
से। पेश है बातचीत के कुछ खास अंश।
अभी-अभी हम
मंदी के दौर से गुजरे हैं जिसके कारण युवाओं ने भारी संख्या में नौकरियां गवाईं हैं। उन
युवाओं के सामने क्या चुनौतियां हैं?
मैं युवाओं को यही कहना
चाहूंगा कि जो हुआ उसे भूल कर नईं शुरुआत करें। काम चाहे कोई भी हो पूरी मेहनत और
शिद्दत के साथ करें क्योंकि जितना गुड़ डालो मीठा उतना ही होता है। काम को काम समझ
कर करें, सिर्फ छोटा-बड़ा समझ कर किसी काम को छोडऩा ठीक नहीं। मेहनत से काम करें
सफलता जरूर मिलेगी।
ग्रेडिंग सिस्टम शुरू होने के कारण कोई फेल नहीं हुआ
जिससे आत्महत्याएं बंद हो गई, यह तो ठीक है पर भविष्य में ग्रेडिंग सिस्टम कितना
प्रभावशाली रहेगा?यह सच है कि ग्रेडिंग सिस्टम से कोई फेल नहीं हुआ।
ग्रेड चाहे कोई भी हो सभी पास हुए हैं। युवाओं के लिए ये तो शुरुआत है। कम्पीटीशन
तो वह 12वीं की परीक्षा के बाद फेस करेंगे। अगर उन्होंने बिना पढ़ाई किए कम ग्रेड
में परीक्षा पास कर भी ली तो उसका कोई फायदा नहीं क्योंकि जब वो कम्पीटीशन एग्जाम
में बैठेंगे तो उन्हें अपनी काबलीयत का पता चलेगा। फिर उनके पास कोई रास्ता नहीं
बचेगा। इसलिए ठीक तो यही होगा कि अच्छी तरह पढ़ाई करें और अच्छे ग्रेड लेकर ही आगे
बढ़े ताकि आपके भविष्य की राह आसान हो सके।
प्रोफैशनल कोर्स करने के बाद
भी जिन युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही उन्हें क्या करना चाहिए?बिजनैस
करें। अगर प्रोफैशनल कोर्स करने के बाद नौकरी नहीं मिल रही तो सारी उमर इसका रोना
रोने से भी कोई फायदा नहीं। अच्छा यही होगा कि वह अपना खुद का बिजनैस शुरू करें और
अपने साथ-साथ दूसरों को भी रोजगार दें। शुरुआत सब छोटे से ही करते हैं, इसलिए चाहे
छोटा ही हो अपना बिजनैस ही करें।
फिल्म इंडस्ट्री में ग्लैमर के कारण लोग महंगे
कोर्स चुनते तो हैं पर कामयाबी नहीं मिलती क्या कहेंगे?
फिल्म
इंडस्ट्री में कामयाब होने में जिंदगी निकल जाती है। अगर युवा समझते हैं कि कोर्स
करने के तुरंत बाद ही उन्हें कामयाबी मिल जाएगी तो यह उनकी भूल है। इस इंडस्ट्री
में तपस्या करनी पड़ती है, तपना पड़ता है तब जाकर सफलता मिलती हैं, और हां सिखर पर
जगह बहुत कम होती है वहां कुछ ही लोग ठहर सकते हैं और वो भी कुछ समय के लिए। इसलिए
ग्लैमर से प्रभावित होकर किसी कोर्स को तभी चुनें जब आपमें दुनिया जीतने की हिम्मत
हो।
युवा विदेशों में पढऩे जाते हैं और फिर वहीं सैटल हो जाते हैं। इस
बारे में आपके क्या विचार हैं?युवा विदेशों में पढऩे जाते हैं और अगर
उन्हें वहीं अच्छी नौकरी मिल जाती है तो वहां रहने में बुराई क्या है। आखिर पढ़ाई
भी तो उन्होंने अच्छी नौकरी पाने के लिए ही की है।
आपके हिसाब से युवाओं
को करियर प्लानिंग कब से शुरू कर देनी चाहिए?
देखिए, जितनी जल्दी बीज
बोया जाएगा उतनी जल्दी ही उसमें पौधा लगेगा जो आगे जाकर पेड़ बन कर दूसरों को छाया
देगा। युवा जितनी जल्दी अपना रोड मैप तैयार करके उस पर चलना शुरू कर देंगे उतनी
जल्दी ही वह संघर्ष के रास्ते को पार कर के कामयाबी की मंजिल तक पहुंच सकेंगे। अपनी
रूचि के हिसाब से यह फैसला कर लें कि आपको कौन सी फिल्ड चुननी है और उस पर काम शुरू
कर दें। अक्सर युवा +2 के बाद ही यह सोचना शुरू करते हैं कि उन्हें डॉक्टर बनना है
या इंजीनियर, ये ठीक नहीं है। अगर किसी ने आईएएस या आईपीएस की परीक्षा पास करनी है
तो वह सातवीं या आठवीं से ही उस बारे में सोचना शुरू कर दे और जब वह 12वीं पास
करेगा तो काफी हद तक उसकी तैयारी हो चुकी होगी। इसलिए मेहनत से काम करें आपको
कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता।
कोचिंग इंस्टीट्यूट बहुत खुल रहे
हैं। हर कोई पास होने की 100 फीसद गारंटी देता है ये कहां तक ठीक
है?
ये सब दुकानें हैं। लोगों ने मुनाफे के लिए दुकानें खोल रखी हैं।
इनमें से कुछ अच्छे लोग भी हैं मगर बुरे लोगों के कारण अच्छों का भट्टा भी बैठ गया
है। ऐसे लोगों पर कार्रवाई करके इनको बंद करवा देना चाहिए।
आज हर युवा
अंग्रेजी में ही पढऩा पसंद करता है। हिन्दी में पढ़ाई तो किसी को मंजूर ही नहीं।
ऐसा क्यों?
नहीं ऐसा नहीं है, आजकल युवा हिंदी को भी उतना ही महत्व
देते हैं जितना कि अंग्रेजी को। दूसरी भाषा को सिखने का क्रेज अच्छी बात है पर उस
चक्कर में अपनी भाषा को भूलना बुरी बात है। इसलिए मैं तो युवाओं को यही कहूंगा कि
अपनी भाषा को में पढ़ाई करें ताकि वो दुनिया में और प्रसिद्ध हो
सके।
आने वाले समय के उभरते क्षेत्र क्या
होंगे?
इंफ्रास्ट्रक्चर, इंडस्ट्री और निर्माण कार्यों में आने वाले
समय में युवाओं के लिए अच्छे भविष्य की उम्मीद की जा सकती है। बशर्ते कि वो मेहनत
करने से पीछे ना हटे।
युवाओं को उज्जवल भविष्य की प्लानिंग के लिए क्या
संदेश देंगे।युवा एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि प्रत्येक व्यक्ति के
लिए दिन 24 घंटों का ही होता है। इसलिए आपकों उन्हीं 24 घंटों में कुछ अजूबा करना
होगा तभी दुनिया आपको याद करेगी। 24 घंटों में अगर आप 8 घंटे सोते हैं, 8 घंटे काम
करते हैं, 2-3 घंटे आपके खाने पीने में खर्च होंगे, इसके बाद आपके पास सिर्फ 3-4
घंटे ही बचेंगे अगर आप वो भी मोबाइल पर बिताएंगे तो अच्छी बात नहीं। काम वही करें
जो आपका दिल कहे। सिर्फ पढऩा ही बड़ी बात नहीं, दिल लगा कर पढऩा बड़ी बात है। किसी
भी काम को टाले ना, काम खत्म करते चलें, अगर किसी से फोन पर बात भी करना चाहते हैं
तो, बात करने के बाद ही दूसरा काम करें। इस तरह दिमाग पर बोझ नहीं रहेगा और आप अपनी
पूरी एनर्जी अगले काम में लगा सकेंगे।
कोर्स चुनते तो हैं पर कामयाबी नहीं मिलती क्या कहेंगे?
फिल्म
इंडस्ट्री में कामयाब होने में जिंदगी निकल जाती है। अगर युवा समझते हैं कि कोर्स
करने के तुरंत बाद ही उन्हें कामयाबी मिल जाएगी तो यह उनकी भूल है। इस इंडस्ट्री
में तपस्या करनी पड़ती है, तपना पड़ता है तब जाकर सफलता मिलती हैं, और हां सिखर पर
जगह बहुत कम होती है वहां कुछ ही लोग ठहर सकते हैं और वो भी कुछ समय के लिए। इसलिए
ग्लैमर से प्रभावित होकर किसी कोर्स को तभी चुनें जब आपमें दुनिया जीतने की हिम्मत
हो।
युवा विदेशों में पढऩे जाते हैं और फिर वहीं सैटल हो जाते हैं। इस
बारे में आपके क्या विचार हैं?युवा विदेशों में पढऩे जाते हैं और अगर
उन्हें वहीं अच्छी नौकरी मिल जाती है तो वहां रहने में बुराई क्या है। आखिर पढ़ाई
भी तो उन्होंने अच्छी नौकरी पाने के लिए ही की है।
आपके हिसाब से युवाओं
को करियर प्लानिंग कब से शुरू कर देनी चाहिए?
देखिए, जितनी जल्दी बीज
बोया जाएगा उतनी जल्दी ही उसमें पौधा लगेगा जो आगे जाकर पेड़ बन कर दूसरों को छाया
देगा। युवा जितनी जल्दी अपना रोड मैप तैयार करके उस पर चलना शुरू कर देंगे उतनी
जल्दी ही वह संघर्ष के रास्ते को पार कर के कामयाबी की मंजिल तक पहुंच सकेंगे। अपनी
रूचि के हिसाब से यह फैसला कर लें कि आपको कौन सी फिल्ड चुननी है और उस पर काम शुरू
कर दें। अक्सर युवा +2 के बाद ही यह सोचना शुरू करते हैं कि उन्हें डॉक्टर बनना है
या इंजीनियर, ये ठीक नहीं है। अगर किसी ने आईएएस या आईपीएस की परीक्षा पास करनी है
तो वह सातवीं या आठवीं से ही उस बारे में सोचना शुरू कर दे और जब वह 12वीं पास
करेगा तो काफी हद तक उसकी तैयारी हो चुकी होगी। इसलिए मेहनत से काम करें आपको
कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता।
कोचिंग इंस्टीट्यूट बहुत खुल रहे
हैं। हर कोई पास होने की 100 फीसद गारंटी देता है ये कहां तक ठीक
है?
ये सब दुकानें हैं। लोगों ने मुनाफे के लिए दुकानें खोल रखी हैं।
इनमें से कुछ अच्छे लोग भी हैं मगर बुरे लोगों के कारण अच्छों का भट्टा भी बैठ गया
है। ऐसे लोगों पर कार्रवाई करके इनको बंद करवा देना चाहिए।
आज हर युवा
अंग्रेजी में ही पढऩा पसंद करता है। हिन्दी में पढ़ाई तो किसी को मंजूर ही नहीं।
ऐसा क्यों?
नहीं ऐसा नहीं है, आजकल युवा हिंदी को भी उतना ही महत्व
देते हैं जितना कि अंग्रेजी को। दूसरी भाषा को सिखने का क्रेज अच्छी बात है पर उस
चक्कर में अपनी भाषा को भूलना बुरी बात है। इसलिए मैं तो युवाओं को यही कहूंगा कि
अपनी भाषा को में पढ़ाई करें ताकि वो दुनिया में और प्रसिद्ध हो
सके।
आने वाले समय के उभरते क्षेत्र क्या
होंगे?
इंफ्रास्ट्रक्चर, इंडस्ट्री और निर्माण कार्यों में आने वाले
समय में युवाओं के लिए अच्छे भविष्य की उम्मीद की जा सकती है। बशर्ते कि वो मेहनत
करने से पीछे ना हटे।
युवाओं को उज्जवल भविष्य की प्लानिंग के लिए क्या
संदेश देंगे।युवा एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि प्रत्येक व्यक्ति के
लिए दिन 24 घंटों का ही होता है। इसलिए आपकों उन्हीं 24 घंटों में कुछ अजूबा करना
होगा तभी दुनिया आपको याद करेगी। 24 घंटों में अगर आप 8 घंटे सोते हैं, 8 घंटे काम
करते हैं, 2-3 घंटे आपके खाने पीने में खर्च होंगे, इसके बाद आपके पास सिर्फ 3-4
घंटे ही बचेंगे अगर आप वो भी मोबाइल पर बिताएंगे तो अच्छी बात नहीं। काम वही करें
जो आपका दिल कहे। सिर्फ पढऩा ही बड़ी बात नहीं, दिल लगा कर पढऩा बड़ी बात है। किसी
भी काम को टाले ना, काम खत्म करते चलें, अगर किसी से फोन पर बात भी करना चाहते हैं
तो, बात करने के बाद ही दूसरा काम करें। इस तरह दिमाग पर बोझ नहीं रहेगा और आप अपनी
पूरी एनर्जी अगले काम में लगा सकेंगे।
Tuesday, December 7, 2010
एक ही शख्स काफी है जानने के लिए
आम लोगों के लिए अमृता प्रीतम इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन वे
आज भी जिंदा हैं। हंसती-बोलती। उन्हें देखने जाना होगा साऊथ दिल्ली के हौज खास
इलाके में। जहां मशहूर आर्टिस्ट इमरोज
अमृता
को जी रहे हैं। शायराना लफ्जों में कहें तो एक जिस्म में दो शख्स जिंदा हैं। इमरोज
की जुबान से बोलतीं अमृता का अहसास उस घर की दरो-दीवार में यूं समाया हैं जैसे
अमृता-इमरोज के भीतर मुहब्बत का समुन्दर। एक कदम आगे के लिए इमरान
खान ने की इमरोज से खास मुलाकात, जिसमें इन दो
शख्ससीयतों के कई पहलु दिखाई दिये। पेश हैं इस मुलाकात के चंद अहम हिस्सों के
लफ्ज।
आप कलाकार हैं, पर आज तक आपने अपनी कोई पेंटिंग बेची नहीं और ना
ही कोई एग्जीबिशन लगाई, ऐसा क्यों?मैं आर्टिस्ट हूं यह बात मुझे पता
है। मैं ये लोगों को क्यों बताऊं कि मैं आर्टिस्ट हूं। जिसे मेरी पेंटिंग पसंद होगी
वो खुद आकर देख लेगा। ना मुझे शौक है कि लोग मेरे बारे में जानें और ना ही अमृता
को। और हां अगर हम एग्जीबिशन लगाएं तो ऐसे लोग आएंगे जो हमें जानते ही नहीं, इसका
क्या मतलब? ये सब फिजूल है। मुझे पता होना चाहिए कि मैं आर्टिस्ट हूं और किसी को
पता नहीं तो भी कोई बात नहीं। मैं और अमृता दोनों इसी तरह ही रहे हैं। हर लेखक की
किताब पर पहले 3-4 पेज की भूमिका होती है, जो दूसरे लोगों ने लिखी होती है। जो सीधा
लेखक को ओब्लाइज करती हैं। अमृता की लगभग 75 किताबें छपी हैं पर उसकी एक भी किताब
पर मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा। हम सिर्फ अपने लिए जिए हैं। मैं अमृता को जानता हूं,
अमृता मुझे जानती है। दुनिया में एक ही आदमी काफी है आपको जानने के लिए। सब समाज का
रोना रोते हैं, आखिर समाज है कहां? आम आदमियों को ही आपने समाज का नाम दे रखा है।
मैं ही अमृता का समाज हूं और वो मेरी समाज है। बाकी किसी से हमें कुछ नहीं
लेना।
आपका रहन-सहन कैसा था?
हम सादे जीवन में ही यकीन रखते
हैं। मैं और अमृता किसी को खाने पर नहीं बुलाते। ये तो हमारी मर्जी है कि हमें किसी
को बुलाना है या नहीं। हम दोनों एक ही सब्जी से खाना खाते हैं। अगर किसी को बुलाते
हैं तो उसके लिए सब्जी भी बनानी पड़ेगी। क्या जरूरत है ये सब करने की। लोग नौकर
क्यों रखते हैं, क्योंकि वह उन्हें आराम देते हैं। वह उनका ध्यान रखते हैं। मैं
अपने कमरे में पेंटिंग बना रहा होता हूं। अमृता अपने कमरे में लिख रही होती है तो
हमें नौकर का ध्यान रखना पड़ता, कि वो क्या कर रहा हैं, इसलिए हम नौकर नहीं रखते।
अगर औरत घर में रहती है तो वो खाना क्यों नहीं बनाती। अमृता इनती बड़ी लेखिका है,
आखिरी समय तक उसने खुद खाना बनाया है। मैं उसके साथ रसोई में काम करता हूं, दोनों
मिल के सारा काम करते हैं। जो काम दो घंटों में होना था, वो एक घंटे में हो जाता
है। हमें नहीं लगता लोगों को घर बुलाना जरूरी है। हां अगर हम खाना खा रहे हैं और
कोई आ जाए तो वह भी हमारे साथ खा ले, जो हम खा रहे हैं।
आप खुदा में
यकीन रखते हैं?लोग मंदिर, मस्जिद या गुरद्वारे क्यों जाते हैं?
क्योंकि उन्होंने भगवान से कुछ मांगना होता है। क्या भगवान किसी का नौकर है? वह
किस-किस के काम करता रहेगा। आप भगवान के पास सिर्फ मांगने जाते हैं। हमें किसी चीज
की जरूरत नहीं, हम नहीं जाते। आप ऐसा क्यों कहते हैं कि अगर हमारा ये काम हो जाए तो
हम हवन या और कुछ करवाएंगे, आप सीधा-सीधा भगवान को रिश्वत दे रहे हैं। अरे भगवान को
तो छोड़ दीजिए। कोई कहता है भगवान मेरी शादी करवा दो। कोई कहता है मुझे पास करवा
दो। और तो और चोर कहता है कि मेरी चोरी पर पर्दा डाले रखना। वो ये नहीं कहता कि
मेरी चोरी की आदत छुड़वा दो। अगर आप सोचते हैं कि खुदा है तो आप सब चीजें उस पर
छोड़ देते हैं। अगर सोचते हैं कि नहीं है तो आप दो तरीकों से सोचते हैं। लोग कहते
हैं कि सब कुछ भगवान की मर्जी से ही होता है। तो अगर किसी का मर्डर होता है, तो फिर
वो भी भगवान की मर्जी से हुआ होगा। तो उसको क्यों पकड़ते हो? भगवान को पकड़ो जाकर।
मर्डर पर आकर बात बदल जाती है।
आप और अमृता मुशायरों में नहीं जाते,
क्यों?मुशायरा और मूड का होता है, हम उसमें फिट नहीं बैठते। मैं कभी
मुशायरे में नहीं जाता, शायद अमृता एक बार गई है। मुशायरा सब शायरों को पसंद भी
नहीं। शायर पर्दे के पीछे शराब पी रहे होते हैं और फिर शायरी शुरू कर देते हैं।
पहले तो छोटे-मोटे शायरों को पढ़वाया जाता है, बड़े शायर तो आखिर में आते हैं, ताकि
भीड़ बनी रहे। ऐसा करने की क्या जरूरत है, क्यों न उन अच्छे शायरों की ही ज्यादा
नज्में सुन ली जाएं।
आपने अमृता जी के साथ अपना पहला जन्मदिन मनाया था,
कैसा महसूस हुआ?
अच्छा लगा। वो तो बाइचांस ही मना लिया। उसके और मेरे
घर में सिर्फ एक सड़क का फासला था। मैं उससे मिलने जाता रहता था। उस दिन हम बैठे
बातें कर रहे थे, तो मैंने उसे बताया कि आज के दिन मैं पैदा भी हुआ था। वो उठ कर
बाहर गई और फिर आकर बैठ गई। हमारे गांव में जन्मदिन मनाने का रिवाज नहीं है, अरे
पैदा हो गए तो हो गए। ये रिवाज तो अंग्रेजों से आया है। थोड़ी देर के बाद उसका नौकर
केक लेकर आया, उसने केक काटा थोड़ा मुझे दिया और थोड़ा खुद खाया। ना उसने मुझे
हैप्पी बर्थडे कहा, ना मैंने उसे थैंक्यू। बस दोनों एक-दूसरे को देखते और
मुस्कुराते रहे।
आप लगभग 40 सालों तक एक साथ रहे, फिर भी कभी प्यार का
इजहार नहीं किया?
इजहार करने की जरूरत क्या है। अगर कोई बिना कुछ बोले
ही सब कुछ बोल दे तो क्या जरूरत है। 40 सालों में हमने एक-दूसरे को आई लव यू नहीं
कहा। प्यार है तो है, बताने की क्या जरूरत है। अगर मुझे कोई खूबसूरत लगता है तो
लगता है। उसको खुद-ब-खुद अहसास हो जाएगा। अगर हम किसी को कहते हैं कि तुम मुझे
खूबसूरत लगती हो, इसका मतलब कि हम कहना चाहते हैं कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं और
तुम भी मुझे प्यार करो। प्यार को इजहार की जरूरत नहीं, इजहार तो कोशिश है प्यार
बनाने की।
अमृता जी खाना बनाना कब शुरू किया था?
अमृता ने
पहले कभी खाना नहीं बनाया था पर जब हम इक्ट्ठे रहते थे तो उसने खाना बनाना शुरू
किया और आखिर तक बनाती रही। उसने मुझे बताया नहीं कि मैं खाना बनाऊंगी, बस बनाना
शुरू कर दिया, जब आपकी आखें सब कुछ बोल रही हों तो लबों से बोलने की जरूरत नहीं
होती। मुझे भी उसके साथ काम करना अच्छा लगता है। आम घरों में क्या होता है आदमी
अखबार पढ़ रहा होता है और औरत अकेले खाना बनाती है। वो सिर्फ ऑर्डर करता है, कभी
चाय लाओ तो कभी पानी। मदद करने किचन में नहीं जाता। वो तो सिर्फ हुक्म देता रहता
है। औरत जिस्म से भी बहुत आगे है और ऐसे लोगों को पूरी औरत नहीं मिलती। पूरी औरत
उसी को मिलती है जिसे वो चाहती है।
उनका कमरा घर की शुरुआत में और आपका
आखिर में, ऐसा क्यों?
मैं एक आर्टिस्ट हूं और वो लेखिका। पता नहीं कब
वो लिखना शुरू कर दे और मैं पेंटिंग करना। इतना बड़ा घर होता है। फिर भी पति-पत्नी
एक बिस्तर पर क्यों सोते हैं? क्योंकि उनका मकसद कुछ और होता है। हमारा ऐसा कुछ
मकसद नहीं, इसलिए हम अलग सोते हैं। सोते वक्त अगर मैं हिलता तो उसे परेशानी होती और
अगर वो हिलती तो मुझे। हम एक-दूसरे को कोई परेशानी नहीं देना चाहते। आज शादियां
सिर्फ औरत का जिस्म पाने के लिए होती हैं। मर्द के लिए औरत सिर्फ सर्विंग वूमैन है,
क्योंकि वह नौकर से सस्ती है। ऐसे लोगों को औरत का प्यार कभी नहीं मिलता। आम आदमी
को औरत सिर्फ जिस्म तक ही मिलती है। प्यार तो किसी किसी को ही मिलता
है।
अब आपका रहन-सहन कैसा है?
अब मैं घर में ही रहता हूं,
क्या जरूरत है बाहर जाने की। कविताएं लिखता हूं, पेंटिंग करता हूं, खुश हूं अपनी
जिंदगी से। हां कभी-कभी सब्जी लेने जरूर चला जाता हूं।
आज कल के लोगों
के बारे में क्या कहेंगे?आज कल कोई जिंदा नहीं है। सब डेड हो चुके
हैं। जो सॉरी नहीं कहता वो मर चुका है क्योंकि जिंदा आदमी कभी न कभी एक बार तो अपनी
गलती का अहसास करता ही है। गुजरात दंगों में एक हजार से ज्यादा मुसलमान मारे गये पर
आज तक गुजरात के किसी एक भी व्यक्ति ने गलती नहीं मानी, क्यों? क्योंकि वो मर चुके
हैं। आज कोई भी मजहब इंसान नहीं बना रहा, सब अपने इस्तेमाल के लिए आदमी बना रहे
हैं। कोई ये नहीं कह सकता है हम दूसरों से अच्छे हैं क्योंकि सब वहशी हो चुके
हैं।
आज भी जिंदा हैं। हंसती-बोलती। उन्हें देखने जाना होगा साऊथ दिल्ली के हौज खास
इलाके में। जहां मशहूर आर्टिस्ट इमरोज
अमृता को जी रहे हैं। शायराना लफ्जों में कहें तो एक जिस्म में दो शख्स जिंदा हैं। इमरोज
की जुबान से बोलतीं अमृता का अहसास उस घर की दरो-दीवार में यूं समाया हैं जैसे
अमृता-इमरोज के भीतर मुहब्बत का समुन्दर। एक कदम आगे के लिए इमरान
खान ने की इमरोज से खास मुलाकात, जिसमें इन दो
शख्ससीयतों के कई पहलु दिखाई दिये। पेश हैं इस मुलाकात के चंद अहम हिस्सों के
लफ्ज।
आप कलाकार हैं, पर आज तक आपने अपनी कोई पेंटिंग बेची नहीं और ना
ही कोई एग्जीबिशन लगाई, ऐसा क्यों?मैं आर्टिस्ट हूं यह बात मुझे पता
है। मैं ये लोगों को क्यों बताऊं कि मैं आर्टिस्ट हूं। जिसे मेरी पेंटिंग पसंद होगी
वो खुद आकर देख लेगा। ना मुझे शौक है कि लोग मेरे बारे में जानें और ना ही अमृता
को। और हां अगर हम एग्जीबिशन लगाएं तो ऐसे लोग आएंगे जो हमें जानते ही नहीं, इसका
क्या मतलब? ये सब फिजूल है। मुझे पता होना चाहिए कि मैं आर्टिस्ट हूं और किसी को
पता नहीं तो भी कोई बात नहीं। मैं और अमृता दोनों इसी तरह ही रहे हैं। हर लेखक की
किताब पर पहले 3-4 पेज की भूमिका होती है, जो दूसरे लोगों ने लिखी होती है। जो सीधा
लेखक को ओब्लाइज करती हैं। अमृता की लगभग 75 किताबें छपी हैं पर उसकी एक भी किताब
पर मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा। हम सिर्फ अपने लिए जिए हैं। मैं अमृता को जानता हूं,
अमृता मुझे जानती है। दुनिया में एक ही आदमी काफी है आपको जानने के लिए। सब समाज का
रोना रोते हैं, आखिर समाज है कहां? आम आदमियों को ही आपने समाज का नाम दे रखा है।
मैं ही अमृता का समाज हूं और वो मेरी समाज है। बाकी किसी से हमें कुछ नहीं
लेना।
आपका रहन-सहन कैसा था?
हम सादे जीवन में ही यकीन रखते
हैं। मैं और अमृता किसी को खाने पर नहीं बुलाते। ये तो हमारी मर्जी है कि हमें किसी
को बुलाना है या नहीं। हम दोनों एक ही सब्जी से खाना खाते हैं। अगर किसी को बुलाते
हैं तो उसके लिए सब्जी भी बनानी पड़ेगी। क्या जरूरत है ये सब करने की। लोग नौकर
क्यों रखते हैं, क्योंकि वह उन्हें आराम देते हैं। वह उनका ध्यान रखते हैं। मैं
अपने कमरे में पेंटिंग बना रहा होता हूं। अमृता अपने कमरे में लिख रही होती है तो
हमें नौकर का ध्यान रखना पड़ता, कि वो क्या कर रहा हैं, इसलिए हम नौकर नहीं रखते।
अगर औरत घर में रहती है तो वो खाना क्यों नहीं बनाती। अमृता इनती बड़ी लेखिका है,
आखिरी समय तक उसने खुद खाना बनाया है। मैं उसके साथ रसोई में काम करता हूं, दोनों
मिल के सारा काम करते हैं। जो काम दो घंटों में होना था, वो एक घंटे में हो जाता
है। हमें नहीं लगता लोगों को घर बुलाना जरूरी है। हां अगर हम खाना खा रहे हैं और
कोई आ जाए तो वह भी हमारे साथ खा ले, जो हम खा रहे हैं।
आप खुदा में
यकीन रखते हैं?लोग मंदिर, मस्जिद या गुरद्वारे क्यों जाते हैं?
क्योंकि उन्होंने भगवान से कुछ मांगना होता है। क्या भगवान किसी का नौकर है? वह
किस-किस के काम करता रहेगा। आप भगवान के पास सिर्फ मांगने जाते हैं। हमें किसी चीज
की जरूरत नहीं, हम नहीं जाते। आप ऐसा क्यों कहते हैं कि अगर हमारा ये काम हो जाए तो
हम हवन या और कुछ करवाएंगे, आप सीधा-सीधा भगवान को रिश्वत दे रहे हैं। अरे भगवान को
तो छोड़ दीजिए। कोई कहता है भगवान मेरी शादी करवा दो। कोई कहता है मुझे पास करवा
दो। और तो और चोर कहता है कि मेरी चोरी पर पर्दा डाले रखना। वो ये नहीं कहता कि
मेरी चोरी की आदत छुड़वा दो। अगर आप सोचते हैं कि खुदा है तो आप सब चीजें उस पर
छोड़ देते हैं। अगर सोचते हैं कि नहीं है तो आप दो तरीकों से सोचते हैं। लोग कहते
हैं कि सब कुछ भगवान की मर्जी से ही होता है। तो अगर किसी का मर्डर होता है, तो फिर
वो भी भगवान की मर्जी से हुआ होगा। तो उसको क्यों पकड़ते हो? भगवान को पकड़ो जाकर।
मर्डर पर आकर बात बदल जाती है।
आप और अमृता मुशायरों में नहीं जाते,
क्यों?मुशायरा और मूड का होता है, हम उसमें फिट नहीं बैठते। मैं कभी
मुशायरे में नहीं जाता, शायद अमृता एक बार गई है। मुशायरा सब शायरों को पसंद भी
नहीं। शायर पर्दे के पीछे शराब पी रहे होते हैं और फिर शायरी शुरू कर देते हैं।
पहले तो छोटे-मोटे शायरों को पढ़वाया जाता है, बड़े शायर तो आखिर में आते हैं, ताकि
भीड़ बनी रहे। ऐसा करने की क्या जरूरत है, क्यों न उन अच्छे शायरों की ही ज्यादा
नज्में सुन ली जाएं।
आपने अमृता जी के साथ अपना पहला जन्मदिन मनाया था,
कैसा महसूस हुआ?
अच्छा लगा। वो तो बाइचांस ही मना लिया। उसके और मेरे
घर में सिर्फ एक सड़क का फासला था। मैं उससे मिलने जाता रहता था। उस दिन हम बैठे
बातें कर रहे थे, तो मैंने उसे बताया कि आज के दिन मैं पैदा भी हुआ था। वो उठ कर
बाहर गई और फिर आकर बैठ गई। हमारे गांव में जन्मदिन मनाने का रिवाज नहीं है, अरे
पैदा हो गए तो हो गए। ये रिवाज तो अंग्रेजों से आया है। थोड़ी देर के बाद उसका नौकर
केक लेकर आया, उसने केक काटा थोड़ा मुझे दिया और थोड़ा खुद खाया। ना उसने मुझे
हैप्पी बर्थडे कहा, ना मैंने उसे थैंक्यू। बस दोनों एक-दूसरे को देखते और
मुस्कुराते रहे।
आप लगभग 40 सालों तक एक साथ रहे, फिर भी कभी प्यार का
इजहार नहीं किया?
इजहार करने की जरूरत क्या है। अगर कोई बिना कुछ बोले
ही सब कुछ बोल दे तो क्या जरूरत है। 40 सालों में हमने एक-दूसरे को आई लव यू नहीं
कहा। प्यार है तो है, बताने की क्या जरूरत है। अगर मुझे कोई खूबसूरत लगता है तो
लगता है। उसको खुद-ब-खुद अहसास हो जाएगा। अगर हम किसी को कहते हैं कि तुम मुझे
खूबसूरत लगती हो, इसका मतलब कि हम कहना चाहते हैं कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं और
तुम भी मुझे प्यार करो। प्यार को इजहार की जरूरत नहीं, इजहार तो कोशिश है प्यार
बनाने की।
अमृता जी खाना बनाना कब शुरू किया था?
अमृता ने
पहले कभी खाना नहीं बनाया था पर जब हम इक्ट्ठे रहते थे तो उसने खाना बनाना शुरू
किया और आखिर तक बनाती रही। उसने मुझे बताया नहीं कि मैं खाना बनाऊंगी, बस बनाना
शुरू कर दिया, जब आपकी आखें सब कुछ बोल रही हों तो लबों से बोलने की जरूरत नहीं
होती। मुझे भी उसके साथ काम करना अच्छा लगता है। आम घरों में क्या होता है आदमी
अखबार पढ़ रहा होता है और औरत अकेले खाना बनाती है। वो सिर्फ ऑर्डर करता है, कभी
चाय लाओ तो कभी पानी। मदद करने किचन में नहीं जाता। वो तो सिर्फ हुक्म देता रहता
है। औरत जिस्म से भी बहुत आगे है और ऐसे लोगों को पूरी औरत नहीं मिलती। पूरी औरत
उसी को मिलती है जिसे वो चाहती है।
उनका कमरा घर की शुरुआत में और आपका
आखिर में, ऐसा क्यों?
मैं एक आर्टिस्ट हूं और वो लेखिका। पता नहीं कब
वो लिखना शुरू कर दे और मैं पेंटिंग करना। इतना बड़ा घर होता है। फिर भी पति-पत्नी
एक बिस्तर पर क्यों सोते हैं? क्योंकि उनका मकसद कुछ और होता है। हमारा ऐसा कुछ
मकसद नहीं, इसलिए हम अलग सोते हैं। सोते वक्त अगर मैं हिलता तो उसे परेशानी होती और
अगर वो हिलती तो मुझे। हम एक-दूसरे को कोई परेशानी नहीं देना चाहते। आज शादियां
सिर्फ औरत का जिस्म पाने के लिए होती हैं। मर्द के लिए औरत सिर्फ सर्विंग वूमैन है,
क्योंकि वह नौकर से सस्ती है। ऐसे लोगों को औरत का प्यार कभी नहीं मिलता। आम आदमी
को औरत सिर्फ जिस्म तक ही मिलती है। प्यार तो किसी किसी को ही मिलता
है।
अब आपका रहन-सहन कैसा है?
अब मैं घर में ही रहता हूं,
क्या जरूरत है बाहर जाने की। कविताएं लिखता हूं, पेंटिंग करता हूं, खुश हूं अपनी
जिंदगी से। हां कभी-कभी सब्जी लेने जरूर चला जाता हूं।
आज कल के लोगों
के बारे में क्या कहेंगे?आज कल कोई जिंदा नहीं है। सब डेड हो चुके
हैं। जो सॉरी नहीं कहता वो मर चुका है क्योंकि जिंदा आदमी कभी न कभी एक बार तो अपनी
गलती का अहसास करता ही है। गुजरात दंगों में एक हजार से ज्यादा मुसलमान मारे गये पर
आज तक गुजरात के किसी एक भी व्यक्ति ने गलती नहीं मानी, क्यों? क्योंकि वो मर चुके
हैं। आज कोई भी मजहब इंसान नहीं बना रहा, सब अपने इस्तेमाल के लिए आदमी बना रहे
हैं। कोई ये नहीं कह सकता है हम दूसरों से अच्छे हैं क्योंकि सब वहशी हो चुके
हैं।
Sunday, December 5, 2010
तैयार हो रही देश की युवा ब्रिगेड
आज जब लोग क्रिकेट के अलावा कुछ और देखना ही नहीं चाहते। बाकी
खेलों की घटती लोकप्रियता के बीच एक ऐसा
इंसान
भी है जो पिछले बीस वर्षों से टेनिस के खिलाडिय़ों को तराश रहा है। ताकि वो विंबलडन
जैसे बड़े टूर्नामेंट में जीत कर भारत को खेलों की दुनिया में बाकी देशों के बराबर
खड़ा कर सके। जिसके लिए बाकायदा कोचिंग सेंटर खोलकर टेनिस में रूचि रखने वाले
युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इमरान
खान
भारत में टेनिस की स्थिति भी क्रिकेट को छोड़ कर बाकी बचे
उन खेलों जैसी ही है जिसमें सिर्फ चंद नाम ही सुनने को मिलते हैं। लिएंडर पेस, महेश
भूपति और सानिया मिर्जा को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई ऐसा नाम हो जिसने टेनिस के
अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में भारत को अन्य देशों के बराबर खड़ा किया हो। जब देश को
अच्छे टेनिस खिलाडिय़ों की सख्त जरुरत है तो एक एकेडमी ऐसी भी है जो पिछले 20 वर्षों
से टेनिस के नए सितारों को तराशने में जुटी है।
क्या है लक्ष्य
: पेनिनसुला नामक टेनिस एकेडमी पिछले 20 सालों से देश के खिलाडिय़ों की
प्रतिभा को निखारने में लगी है। ये भारत की सबसे पुरानी और बड़ी टेनिस एकेडमी भी
है। दिल्ली, गुडग़ांव, नोएडा, फरीदाबाद, कानपुर और जालंधर समेत देश भर के 27 कोचिंग
सेंटरों के करीब 6000 टेनिस खिलाड़ी इस एकेडमी में भविष्य के टेनिस को नए आयाम और
अपने सपनों को उन्मुक्त आसमान देने की कोशिश कर रहे हैं।
नहीं है
सुविधाओं की कमी : यहां खिलाडिय़ों को आगे बढऩे के लिए हर तरह की सुविधा दी
जाती है। यह भारत की ऐसी पहली एकेडमी है जहां खिलाडिय़ों को टेनिस मशीन द्वारा
ट्रेनिंग दी जाती है। भारत में पहली बार इन हाऊस ट्रेनिंग का श्रेय भी इसी एकेडमी
को जाता है। स्टेट या नेशनल स्तर के टूर्नामेंटों के अलावा एकेडमी के दूसरे सेंटरों
के खिलाडिय़ों में भी मैच करवाए जाते हैं ताकि खिलाडिय़ों में प्रतियोगिता की भावना
पैदा हो सके और वे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने को तैयार हो सकें। इसी एकेडमी से
नेशनल लेवल के कई खिलाड़ी भी नाम कमा चुके हैं।
विंबलडन है
टार्गेट : : पेनिनसुला टेनिस एकेडमी केचेयरमैन बॉबी सिंह बताते हैं
कि उनकी एकेडमी का एकमात्र लक्ष्य यही है कि भारत के खिलाड़ी विंबलडन में जीत का
परचम लहराएं। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वो पिछले बीस वर्षों से दिन रात मेहनत
कर रहे हैं और तब तक करते रहेंगे जब तक उनका ये सपना पूरा नहीं हो
जाता।
स्र्पोट्स कल्चर का अभाव : उनके मुताबिक सरकार को
स्कूलों में स्र्पोट्स कल्चर होना बहुत जरूरी है। सरकार शिक्षा प्रणाली में सुधार
करके खेलों को पढ़ाई के एक अंग के रुप में उभारे जिससे विद्यार्थी में खेलों के
प्रति समर्पण का भाव पैदा हो तो ही हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा सकेंगे।
स्पोर्ट्स कल्चर शुरू होने से विद्यार्थी पढ़ाई के साथ खेलों पर भी ज्यादा ध्यान
देंगे। अगर सरकार स्कूलों में स्पोर्ट्स कल्चर पैदा करने में कामयाब हो जाती है तो
भारत को भी खेलों की दुनिया में छा जाने से कोई नहीं रोक सकता।
उत्साह
से लबरेज हैं युवा खिलाड़ी : स्टेट और नेशनल लेवल के टूर्नामेंट खेल चुकी
पूर्वा चौधरी और अशोक कुमार को अच्छा लगता है जब वो कोई टूर्नामेंट जीतकर घर आते
हैं। पूर्वा चौधरी बताती हैं कि सानिया मिर्जा उनकी रोल मॉडल है और वो सानिया की
तरह एक अच्छी खिलाड़ी बनकर देश का नाम रोशन करना चाहती है। पूर्वा, सानिया का कोई
भी मैच मिस नहीं करती और उसके हर मैच से उसे कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है। नेशनल
लेवल के टूर्नामेंटों में अपने अपनी प्रतिभा दिखा चुके अशोक कुमार रोजर फेडरर के
खेल से काफी प्र्रभावित है और उनके जैसा ही बनना चाहते हैं। अशोक का कहना है कि
स्टेट और राष्ट्रीय स्तर पर कुछ और नए टूर्नामेंट शुरू होने चाहिए जिससे खिलाडिय़ों
को और ज्यादा घरेलू मैच खेलने का मौका मिल सके जिससे वो बड़ी चुनौतियों का सामने
करने में सक्ष्म हो सकें।
सख्त मेहनत की जरूरत :
कोच अजय और विजय बताते हैं हमारे खिलाडिय़ों में मेहनत की कमी है। स्टेट या नेशनल
लेवल पर खेलने के बाद खिलाड़ी प्रैक्टिस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। शायद इसी कारण
हमारे खिलाड़ी बड़े स्तर के टूर्नामेंटों में अच्छा प्रर्दशन नहीं कर पाते।
खिलाडिय़ों को कम से कम 5 घंटे रोजाना कोर्ट में पसीना बहाने की जरुरत है इसके बाद
ही इंटरनेश्नल लेवल पर ये अपनी जीत का परचम लहरा सकेंगे। खिलाडिय़ों को एक और बात पर
ध्यान देना जरूरी है कि वो ट्रेनिंग को बीच में न छोड़ें , क्योंकि ऐसा करने से लय
खराब होती है जिससे वो अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते जिसका असर सीधे उसके खेल
पर पड़ता है। उनके मुताबिक जब हमारे खिलाड़ी नेशनल लेवल पर जीतते हैं तो वे
स्पोर्टसमैन कम और बिजनेसमैन ज्यादा हो जाते हैं। उनके पास एड और मॉडलिंग के इतने
ऑफर आने शुरू हो जाते हैं कि वो खेल की तरफ ध्यान देना बंद कर देतें हैं और उनका
मकसद सिर्फ पैसा कमाना ही हो जाता है। ऐसे खिलाड़ी फिर इंटरनेशनल लेवल पर ज्यादा
कामयाब नहीं हो पाते क्योंकि खेल में तरक्की करने का एकमात्र तरीका सिर्फ प्रैक्टिस
ही है।
खेलों की घटती लोकप्रियता के बीच एक ऐसा
इंसान भी है जो पिछले बीस वर्षों से टेनिस के खिलाडिय़ों को तराश रहा है। ताकि वो विंबलडन
जैसे बड़े टूर्नामेंट में जीत कर भारत को खेलों की दुनिया में बाकी देशों के बराबर
खड़ा कर सके। जिसके लिए बाकायदा कोचिंग सेंटर खोलकर टेनिस में रूचि रखने वाले
युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इमरान
खान
भारत में टेनिस की स्थिति भी क्रिकेट को छोड़ कर बाकी बचे
उन खेलों जैसी ही है जिसमें सिर्फ चंद नाम ही सुनने को मिलते हैं। लिएंडर पेस, महेश
भूपति और सानिया मिर्जा को छोड़ दिया जाए तो शायद ही कोई ऐसा नाम हो जिसने टेनिस के
अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में भारत को अन्य देशों के बराबर खड़ा किया हो। जब देश को
अच्छे टेनिस खिलाडिय़ों की सख्त जरुरत है तो एक एकेडमी ऐसी भी है जो पिछले 20 वर्षों
से टेनिस के नए सितारों को तराशने में जुटी है।
क्या है लक्ष्य
: पेनिनसुला नामक टेनिस एकेडमी पिछले 20 सालों से देश के खिलाडिय़ों की
प्रतिभा को निखारने में लगी है। ये भारत की सबसे पुरानी और बड़ी टेनिस एकेडमी भी
है। दिल्ली, गुडग़ांव, नोएडा, फरीदाबाद, कानपुर और जालंधर समेत देश भर के 27 कोचिंग
सेंटरों के करीब 6000 टेनिस खिलाड़ी इस एकेडमी में भविष्य के टेनिस को नए आयाम और
अपने सपनों को उन्मुक्त आसमान देने की कोशिश कर रहे हैं।
नहीं है
सुविधाओं की कमी : यहां खिलाडिय़ों को आगे बढऩे के लिए हर तरह की सुविधा दी
जाती है। यह भारत की ऐसी पहली एकेडमी है जहां खिलाडिय़ों को टेनिस मशीन द्वारा
ट्रेनिंग दी जाती है। भारत में पहली बार इन हाऊस ट्रेनिंग का श्रेय भी इसी एकेडमी
को जाता है। स्टेट या नेशनल स्तर के टूर्नामेंटों के अलावा एकेडमी के दूसरे सेंटरों
के खिलाडिय़ों में भी मैच करवाए जाते हैं ताकि खिलाडिय़ों में प्रतियोगिता की भावना
पैदा हो सके और वे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने को तैयार हो सकें। इसी एकेडमी से
नेशनल लेवल के कई खिलाड़ी भी नाम कमा चुके हैं।
विंबलडन है
टार्गेट : : पेनिनसुला टेनिस एकेडमी केचेयरमैन बॉबी सिंह बताते हैं
कि उनकी एकेडमी का एकमात्र लक्ष्य यही है कि भारत के खिलाड़ी विंबलडन में जीत का
परचम लहराएं। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वो पिछले बीस वर्षों से दिन रात मेहनत
कर रहे हैं और तब तक करते रहेंगे जब तक उनका ये सपना पूरा नहीं हो
जाता।
स्र्पोट्स कल्चर का अभाव : उनके मुताबिक सरकार को
स्कूलों में स्र्पोट्स कल्चर होना बहुत जरूरी है। सरकार शिक्षा प्रणाली में सुधार
करके खेलों को पढ़ाई के एक अंग के रुप में उभारे जिससे विद्यार्थी में खेलों के
प्रति समर्पण का भाव पैदा हो तो ही हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा सकेंगे।
स्पोर्ट्स कल्चर शुरू होने से विद्यार्थी पढ़ाई के साथ खेलों पर भी ज्यादा ध्यान
देंगे। अगर सरकार स्कूलों में स्पोर्ट्स कल्चर पैदा करने में कामयाब हो जाती है तो
भारत को भी खेलों की दुनिया में छा जाने से कोई नहीं रोक सकता।
उत्साह
से लबरेज हैं युवा खिलाड़ी : स्टेट और नेशनल लेवल के टूर्नामेंट खेल चुकी
पूर्वा चौधरी और अशोक कुमार को अच्छा लगता है जब वो कोई टूर्नामेंट जीतकर घर आते
हैं। पूर्वा चौधरी बताती हैं कि सानिया मिर्जा उनकी रोल मॉडल है और वो सानिया की
तरह एक अच्छी खिलाड़ी बनकर देश का नाम रोशन करना चाहती है। पूर्वा, सानिया का कोई
भी मैच मिस नहीं करती और उसके हर मैच से उसे कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है। नेशनल
लेवल के टूर्नामेंटों में अपने अपनी प्रतिभा दिखा चुके अशोक कुमार रोजर फेडरर के
खेल से काफी प्र्रभावित है और उनके जैसा ही बनना चाहते हैं। अशोक का कहना है कि
स्टेट और राष्ट्रीय स्तर पर कुछ और नए टूर्नामेंट शुरू होने चाहिए जिससे खिलाडिय़ों
को और ज्यादा घरेलू मैच खेलने का मौका मिल सके जिससे वो बड़ी चुनौतियों का सामने
करने में सक्ष्म हो सकें।
सख्त मेहनत की जरूरत :
कोच अजय और विजय बताते हैं हमारे खिलाडिय़ों में मेहनत की कमी है। स्टेट या नेशनल
लेवल पर खेलने के बाद खिलाड़ी प्रैक्टिस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। शायद इसी कारण
हमारे खिलाड़ी बड़े स्तर के टूर्नामेंटों में अच्छा प्रर्दशन नहीं कर पाते।
खिलाडिय़ों को कम से कम 5 घंटे रोजाना कोर्ट में पसीना बहाने की जरुरत है इसके बाद
ही इंटरनेश्नल लेवल पर ये अपनी जीत का परचम लहरा सकेंगे। खिलाडिय़ों को एक और बात पर
ध्यान देना जरूरी है कि वो ट्रेनिंग को बीच में न छोड़ें , क्योंकि ऐसा करने से लय
खराब होती है जिससे वो अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते जिसका असर सीधे उसके खेल
पर पड़ता है। उनके मुताबिक जब हमारे खिलाड़ी नेशनल लेवल पर जीतते हैं तो वे
स्पोर्टसमैन कम और बिजनेसमैन ज्यादा हो जाते हैं। उनके पास एड और मॉडलिंग के इतने
ऑफर आने शुरू हो जाते हैं कि वो खेल की तरफ ध्यान देना बंद कर देतें हैं और उनका
मकसद सिर्फ पैसा कमाना ही हो जाता है। ऐसे खिलाड़ी फिर इंटरनेशनल लेवल पर ज्यादा
कामयाब नहीं हो पाते क्योंकि खेल में तरक्की करने का एकमात्र तरीका सिर्फ प्रैक्टिस
ही है।
Friday, December 3, 2010
फैशन इंडस्ट्री : मंजिलें और भी हैं
अगर आप
स्वतंत्र
रुप से फैशन इंडस्ट्री में छाने की इच्छा रखते हैं तो इसकी शुरुआत बुटिक से करना
ठीक होगा क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक पैसों की भी आवश्यक्ता नहीं पड़ेगी। इसके लिए
आपके पास कटाई और सिलाई की जानकारी होना आवश्यक है। इससे आपको पर्याप्त आमदनी तो
होगी ही साथ ही साथ आप दूसरों को भी रोजगार मुहैया करवा सकेंगे।
इमरान
खानफैशन का मतलब सिर्फ मॉडल या डिजाइनर
बनना ही नहीं है। यह तो एक ऐसा शब्द है जो अपने अंदर हज़ारों अर्थ समेटे हुए है।
फैशन इंडस्ट्री में मॉडल या डिज़ाइनर बनने के अलावा और भी ऐसे बहुत से जगजमाते
करियर आप्शन है जिनमें युवा अपनी मंजि़ल तलाश सकते हैं। युवा वर्ग इन कोर्सों के
माध्यम से अपनी सोच को पंख तो दे ही सकते हैं साथ ही यह उनकी आजीविका का एक अच्छा
साधन भी साबित हो सकता है। अक्सर ऐसा समझा जाता है कि एक फैशन डिज़ाइनर एक दर्जी ही
होता है पर डिज़ाइनर एक ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है जो अपनी सोच को अपनी कलम की मदद
से कागज़ पर उतारे यानि डिज़ाइनर वह है जो किसी चीज़ का डिज़ाइन या खाका अपने हिसाब
से तैयार करे। फैशन की दुनिया में ऐसे बहुत से शॉर्ट और लांग टर्म कोर्स करवाए जाते
हैं जिनके बाद आप फैशन की चकाचौंध का हिस्सा बन सकते
हैं।मर्चेंडाइजर : मर्चेंडाइजर उस व्यक्ति को
कहा जाता है जो एक कंपनी तथा खरीददार के बीच एक कड़ी का काम करता है। कंपनियां ऐसे
लोगों को नौकरी पर रखती हैं जिनकी बोलने की क्षमता अच्छी हो तथा जो जल्द ही अपनी
बात दूसरे लोगों को समझा सकते हों। मर्चेंडाइजर आयात तथा निर्यात दोनों तरह की
कंपनियों में होते हैं। इनका एक महत्वपूर्ण कार्य यह भी होता है कि वो कंपनी के
विभिन्न विभागों में समन्वय बनाकर रखते हैं। एक सफल मर्चेंडाइजर बनने के लिए आपमें
अपनी बात दूसरों को समझाने की कला तो होनी ही चाहिए इसके साथ ही अंग्रेजी की अच्छी
जानकारी भी होनी आवश्यक है क्योंकि भारत का फैशन के क्षेत्र में अधिकतर व्यापार
विदेशी कंपनियों से ही होता है।
एसेसरी डिज़ाइनिंग : अगर आप
कपड़ों के अलावा कुछ और डिज़ाइन करने के बारे में सोच रहे हैं तो फुटवियर और
ज्वैलरी आपके लिए बढिय़ा ऑप्शन हो सकते हैं। इसमें जूतों के नए डिज़ाइन तैयार करना,
ज्वैलरी में नए-नए डिज़ाइन विकसित करना आदि शामिल है।
कॉस्ट्यूम डिजाइनर
: कास्ट्यूम डिज़ाइनर वास्तव में वह व्यक्ति होता है जो कपड़ों को फाइनल
टच देता है। फिल्म इंडस्ट्री में आज ऐसे युवाओं की भारी तादाद में जरुरत हैं जो
बदलते फैशन के हिसाब से नए डिजाइन मुहैया करवा सकें। इनको सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष
के साइज़ के हिसाब से ही कपड़े बनाने होते हैं।
पैटर्न मेकर :
पैटर्न मेकर वह व्यक्ति होता है जो किसी कपड़े के डिजाइन के मुताबिक पैटर्न तैयार
करता है और फिर पैटर्न की सहायता से कपड़ों को तैयार किया जाता है।
फैशन
इलस्ट्रेटर : यदि आप ड्राइंग में रुचि रखते हैं और फैशन की दुनिया में
छाना चाहते हैं तो फैशन इलस्ट्रेटर आपके लिए बिल्कुल सही रास्ता है। फैशन
इलस्ट्रेटर का कार्य विभिन्न डिजाइनों के इलस्ट्रेशन तैयार करना होता है। इसके लिए
ज्यादा पढ़ाई की भी आवश्यक्ता नहीं सिर्फ आपकी सोच फैशन के मुताबिक बदलनी
चाहिए।टैक्सटाइल डिजाइनिंग : अगर आप किसी कपड़े
के ताने-बाने को समझ कर उस में रुचि लेते हैं तो टैक्सटाइल में करियर बना सकते हैं।
टैक्सटाइल डिजाइनिंग करने के लिए आप बी. टैक या बी. एस. सी. कर सकते हैं। यह तीन
साल की डिग्री है। ऐसे और भी बहुत से शॉर्ट और लांग टर्म कोर्स विभिन्न इंस्टीट्यूट
और युनिवर्सिटीज़ में करवाए जाते हैं। इन कोर्सों के लिए यह मायने नहीं रखता कि
युवा गांव का है या शहर का। बस आपकी पारखी नजर फैशन को समझती है तो कोई भी आपको
बुलंदी पर जाने से रोक नहीं सकता।मेकअप आर्टिस्ट : जिन युवाओं का रुझान फैशन के अलावा मेकअप आदि के क्षेत्र में है उनके लिए
मेकअप आर्टिस्ट का करियर ठीक रहेगा। एक मेकअप आर्टिस्ट का मुख्य कार्य परदे के पीछे
रह कर मॉडल या हीरोइन को तैयार करना तथा मेकअप द्वारा उसके व्यक्तित्व को और
आकर्षित बनाना होता है। यह बात अलग है कि इस प्रकार के कोर्स ज्यादातर लड़कियां ही
पसंद करती हैं। यह एक शार्ट टर्म बेस कोर्स है जो लगभग 6 महीने में करवाया जाता है।
इस प्रकार के कोर्स करने वाले युवाओं की मांग फिल्म इंडस्ट्री में तेजी से बढ़ रही
है। जिस गति से फिल्मों का निर्माण हो रहा है, यह कहा जा सकता है कि अगले 5 सालों
में मेकअप आर्टिस्ट की मांग में और इजाफा
होगा।फैशन पत्रकारिता : प्रतियोगिता के इस दौर में आज हर क्षेत्र में महारत रखने वालों की
आवश्यकता है। इसलिए विभिन्न फैशन पत्रिकाओं एवं अखबारों को ऐसे युवाओं की आवश्यक्ता
है जो फैशन में रुचि तो रखते ही हों साथ ही उनका झुकाव पत्रकारिता की ओर भी हो। अगर
आप भी इन दोनों में रुचि रखते हैं तो फैशन राइटर, फैशन एडिटर, फैशन फोटोग्राफर आदि
कोर्स आपके लिए बढिय़ा हो सकते हैं। इसके लिए आपका दिमाग क्रियेटिव तो होना ही चाहिए
साथ-साथ आपकी फैशन पर पकड़ भी अच्छी होनी चाहिए। आजकल डिजीटल फोटोग्राफी के बढ़ते
रुझान के कारण भी फैशन से जुड़े उद्योगो को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो इस काम
में महारत रखते हों। फिल्म नगरी मुंबई में भी फैशन की जानकारी रखने वाले युवाओं की
भारी संख्या में जरुरत है जो तस्वीरों को अलग ढंग से पेश करने की कला जानते हों।
ऐसे युवाओं का भविष्य अच्छा है।एक्सपटर्स
व्यूज...इंस्टीट्यूट ऑफ अपैरल मैनेजमैंट के ज्वाइंट
डॉयरेक्टर सोमेश सिंह बताते हैं कि उनके इंस्टीट्यूट में बी. ए. इन फैशन डिज़ाइन और
बी. ए. इन अपैरल मर्चेंडाइजिंग में डिग्री करवाई जाती है जिस के बाद विद्यार्थी
फैशन इंडस्ट्री में करियर बना सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि शार्ट टर्म
कोर्सों में ऐक्सपोर्ट एंड मर्चेंडाइजिंग छह महीने और डिज़ाइन इन स्टाइलिंग फॉर
फैशन शो छह महीने की अवधि के करवाए जाते हैं जिस के बाद विद्यार्थी फैशन की दुनिया
का हिस्सा बन सकते हैं। डिजाइन इन स्टाइलिंग फॉर फैशन के अन्तगर्त विद्यार्थियों को
यह पढ़ाया जाता है कि वह फैशन शो को कैसे कामयाब बना सकते हैं तथा वह उन पहलुओं पर
ध्यान देते हैं जिन पर एक फैशन डिजाइनर ध्यान न दे पाया हो। उनके मुताबिक उनके
इंस्टीट्यूट से कोर्स करने वाले विद्यार्थीयों को 100 प्रतिशत प्लेसमैंट दी जाती
है।जे. डी. इंस्टीटयूट के कार्यकारी निदेशक आर. सी. दलाल के मुताबिक उनके इंस्टीटयूट में शॉर्ट टर्म कोर्स में फैशन डिजाइन 1 साल,
फैशन बिजनैस मैनेजमैंट 1 साल और इंटीरीअर डिजाइन में भी एक साल के कोर्स करवाए जाते
हैं। उन्होंने बताया कि विद्यार्थी इन कोर्सों को करने के बाद फैशन इंडस्ट्री में
नाम कमा सकते हैं। उनके मुताबिक उनके इंस्टीटयूट से कोर्स करने वाले प्रत्येक
विद्यार्थी को प्लेसमैंट में मदद की जाती है। उन्होंने बताया कि फैशन मैनेजमैंट में
यह पढ़ाया जाता है कि विभिन्न फैशन शो और अन्य फैशन संबंधित कार्यक्रमों को कैसे
मैनेज करना है तथा इनको कैसे सफल बनाना है।14 सालों से
सहेली नामक बुटीक चला रही वंदना वर्मा बताती हैं कि युवाओं के लिए फैशन
इंडस्ट्री में अच्छा भविष्य है मगर इसके लिए उन्हें सही ट्रेनिंग की आवश्यकता है।
युवा अगर फैशन कोर्स करने के बाद बुटीक के रुप में शुरुआत करना चाहते हैं तो उन्हें
कम से कम 2 महीने की ट्रेनिंग लेनी चाहिए क्योंकि किसी भी काम के लिए तर्जुबा जरुरी
है। उन्होंने बताया कि बुटीक एक ऐसा व्यवसाय है जिसे कम पैसों से शुरू किया जा सकता
है और इससे अच्छी आमदनी भी हो सकती है साथ ही आप दूसरों को रोजगार भी दे सकते
हैं।
स्वतंत्र रुप से फैशन इंडस्ट्री में छाने की इच्छा रखते हैं तो इसकी शुरुआत बुटिक से करना
ठीक होगा क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक पैसों की भी आवश्यक्ता नहीं पड़ेगी। इसके लिए
आपके पास कटाई और सिलाई की जानकारी होना आवश्यक है। इससे आपको पर्याप्त आमदनी तो
होगी ही साथ ही साथ आप दूसरों को भी रोजगार मुहैया करवा सकेंगे।
इमरान
खानफैशन का मतलब सिर्फ मॉडल या डिजाइनर
बनना ही नहीं है। यह तो एक ऐसा शब्द है जो अपने अंदर हज़ारों अर्थ समेटे हुए है।
फैशन इंडस्ट्री में मॉडल या डिज़ाइनर बनने के अलावा और भी ऐसे बहुत से जगजमाते
करियर आप्शन है जिनमें युवा अपनी मंजि़ल तलाश सकते हैं। युवा वर्ग इन कोर्सों के
माध्यम से अपनी सोच को पंख तो दे ही सकते हैं साथ ही यह उनकी आजीविका का एक अच्छा
साधन भी साबित हो सकता है। अक्सर ऐसा समझा जाता है कि एक फैशन डिज़ाइनर एक दर्जी ही
होता है पर डिज़ाइनर एक ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है जो अपनी सोच को अपनी कलम की मदद
से कागज़ पर उतारे यानि डिज़ाइनर वह है जो किसी चीज़ का डिज़ाइन या खाका अपने हिसाब
से तैयार करे। फैशन की दुनिया में ऐसे बहुत से शॉर्ट और लांग टर्म कोर्स करवाए जाते
हैं जिनके बाद आप फैशन की चकाचौंध का हिस्सा बन सकते
हैं।मर्चेंडाइजर : मर्चेंडाइजर उस व्यक्ति को
कहा जाता है जो एक कंपनी तथा खरीददार के बीच एक कड़ी का काम करता है। कंपनियां ऐसे
लोगों को नौकरी पर रखती हैं जिनकी बोलने की क्षमता अच्छी हो तथा जो जल्द ही अपनी
बात दूसरे लोगों को समझा सकते हों। मर्चेंडाइजर आयात तथा निर्यात दोनों तरह की
कंपनियों में होते हैं। इनका एक महत्वपूर्ण कार्य यह भी होता है कि वो कंपनी के
विभिन्न विभागों में समन्वय बनाकर रखते हैं। एक सफल मर्चेंडाइजर बनने के लिए आपमें
अपनी बात दूसरों को समझाने की कला तो होनी ही चाहिए इसके साथ ही अंग्रेजी की अच्छी
जानकारी भी होनी आवश्यक है क्योंकि भारत का फैशन के क्षेत्र में अधिकतर व्यापार
विदेशी कंपनियों से ही होता है।
एसेसरी डिज़ाइनिंग : अगर आप
कपड़ों के अलावा कुछ और डिज़ाइन करने के बारे में सोच रहे हैं तो फुटवियर और
ज्वैलरी आपके लिए बढिय़ा ऑप्शन हो सकते हैं। इसमें जूतों के नए डिज़ाइन तैयार करना,
ज्वैलरी में नए-नए डिज़ाइन विकसित करना आदि शामिल है।
कॉस्ट्यूम डिजाइनर
: कास्ट्यूम डिज़ाइनर वास्तव में वह व्यक्ति होता है जो कपड़ों को फाइनल
टच देता है। फिल्म इंडस्ट्री में आज ऐसे युवाओं की भारी तादाद में जरुरत हैं जो
बदलते फैशन के हिसाब से नए डिजाइन मुहैया करवा सकें। इनको सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष
के साइज़ के हिसाब से ही कपड़े बनाने होते हैं।
पैटर्न मेकर :
पैटर्न मेकर वह व्यक्ति होता है जो किसी कपड़े के डिजाइन के मुताबिक पैटर्न तैयार
करता है और फिर पैटर्न की सहायता से कपड़ों को तैयार किया जाता है।
फैशन
इलस्ट्रेटर : यदि आप ड्राइंग में रुचि रखते हैं और फैशन की दुनिया में
छाना चाहते हैं तो फैशन इलस्ट्रेटर आपके लिए बिल्कुल सही रास्ता है। फैशन
इलस्ट्रेटर का कार्य विभिन्न डिजाइनों के इलस्ट्रेशन तैयार करना होता है। इसके लिए
ज्यादा पढ़ाई की भी आवश्यक्ता नहीं सिर्फ आपकी सोच फैशन के मुताबिक बदलनी
चाहिए।टैक्सटाइल डिजाइनिंग : अगर आप किसी कपड़े
के ताने-बाने को समझ कर उस में रुचि लेते हैं तो टैक्सटाइल में करियर बना सकते हैं।
टैक्सटाइल डिजाइनिंग करने के लिए आप बी. टैक या बी. एस. सी. कर सकते हैं। यह तीन
साल की डिग्री है। ऐसे और भी बहुत से शॉर्ट और लांग टर्म कोर्स विभिन्न इंस्टीट्यूट
और युनिवर्सिटीज़ में करवाए जाते हैं। इन कोर्सों के लिए यह मायने नहीं रखता कि
युवा गांव का है या शहर का। बस आपकी पारखी नजर फैशन को समझती है तो कोई भी आपको
बुलंदी पर जाने से रोक नहीं सकता।मेकअप आर्टिस्ट : जिन युवाओं का रुझान फैशन के अलावा मेकअप आदि के क्षेत्र में है उनके लिए
मेकअप आर्टिस्ट का करियर ठीक रहेगा। एक मेकअप आर्टिस्ट का मुख्य कार्य परदे के पीछे
रह कर मॉडल या हीरोइन को तैयार करना तथा मेकअप द्वारा उसके व्यक्तित्व को और
आकर्षित बनाना होता है। यह बात अलग है कि इस प्रकार के कोर्स ज्यादातर लड़कियां ही
पसंद करती हैं। यह एक शार्ट टर्म बेस कोर्स है जो लगभग 6 महीने में करवाया जाता है।
इस प्रकार के कोर्स करने वाले युवाओं की मांग फिल्म इंडस्ट्री में तेजी से बढ़ रही
है। जिस गति से फिल्मों का निर्माण हो रहा है, यह कहा जा सकता है कि अगले 5 सालों
में मेकअप आर्टिस्ट की मांग में और इजाफा
होगा।फैशन पत्रकारिता : प्रतियोगिता के इस दौर में आज हर क्षेत्र में महारत रखने वालों की
आवश्यकता है। इसलिए विभिन्न फैशन पत्रिकाओं एवं अखबारों को ऐसे युवाओं की आवश्यक्ता
है जो फैशन में रुचि तो रखते ही हों साथ ही उनका झुकाव पत्रकारिता की ओर भी हो। अगर
आप भी इन दोनों में रुचि रखते हैं तो फैशन राइटर, फैशन एडिटर, फैशन फोटोग्राफर आदि
कोर्स आपके लिए बढिय़ा हो सकते हैं। इसके लिए आपका दिमाग क्रियेटिव तो होना ही चाहिए
साथ-साथ आपकी फैशन पर पकड़ भी अच्छी होनी चाहिए। आजकल डिजीटल फोटोग्राफी के बढ़ते
रुझान के कारण भी फैशन से जुड़े उद्योगो को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो इस काम
में महारत रखते हों। फिल्म नगरी मुंबई में भी फैशन की जानकारी रखने वाले युवाओं की
भारी संख्या में जरुरत है जो तस्वीरों को अलग ढंग से पेश करने की कला जानते हों।
ऐसे युवाओं का भविष्य अच्छा है।एक्सपटर्स
व्यूज...इंस्टीट्यूट ऑफ अपैरल मैनेजमैंट के ज्वाइंट
डॉयरेक्टर सोमेश सिंह बताते हैं कि उनके इंस्टीट्यूट में बी. ए. इन फैशन डिज़ाइन और
बी. ए. इन अपैरल मर्चेंडाइजिंग में डिग्री करवाई जाती है जिस के बाद विद्यार्थी
फैशन इंडस्ट्री में करियर बना सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि शार्ट टर्म
कोर्सों में ऐक्सपोर्ट एंड मर्चेंडाइजिंग छह महीने और डिज़ाइन इन स्टाइलिंग फॉर
फैशन शो छह महीने की अवधि के करवाए जाते हैं जिस के बाद विद्यार्थी फैशन की दुनिया
का हिस्सा बन सकते हैं। डिजाइन इन स्टाइलिंग फॉर फैशन के अन्तगर्त विद्यार्थियों को
यह पढ़ाया जाता है कि वह फैशन शो को कैसे कामयाब बना सकते हैं तथा वह उन पहलुओं पर
ध्यान देते हैं जिन पर एक फैशन डिजाइनर ध्यान न दे पाया हो। उनके मुताबिक उनके
इंस्टीट्यूट से कोर्स करने वाले विद्यार्थीयों को 100 प्रतिशत प्लेसमैंट दी जाती
है।जे. डी. इंस्टीटयूट के कार्यकारी निदेशक आर. सी. दलाल के मुताबिक उनके इंस्टीटयूट में शॉर्ट टर्म कोर्स में फैशन डिजाइन 1 साल,
फैशन बिजनैस मैनेजमैंट 1 साल और इंटीरीअर डिजाइन में भी एक साल के कोर्स करवाए जाते
हैं। उन्होंने बताया कि विद्यार्थी इन कोर्सों को करने के बाद फैशन इंडस्ट्री में
नाम कमा सकते हैं। उनके मुताबिक उनके इंस्टीटयूट से कोर्स करने वाले प्रत्येक
विद्यार्थी को प्लेसमैंट में मदद की जाती है। उन्होंने बताया कि फैशन मैनेजमैंट में
यह पढ़ाया जाता है कि विभिन्न फैशन शो और अन्य फैशन संबंधित कार्यक्रमों को कैसे
मैनेज करना है तथा इनको कैसे सफल बनाना है।14 सालों से
सहेली नामक बुटीक चला रही वंदना वर्मा बताती हैं कि युवाओं के लिए फैशन
इंडस्ट्री में अच्छा भविष्य है मगर इसके लिए उन्हें सही ट्रेनिंग की आवश्यकता है।
युवा अगर फैशन कोर्स करने के बाद बुटीक के रुप में शुरुआत करना चाहते हैं तो उन्हें
कम से कम 2 महीने की ट्रेनिंग लेनी चाहिए क्योंकि किसी भी काम के लिए तर्जुबा जरुरी
है। उन्होंने बताया कि बुटीक एक ऐसा व्यवसाय है जिसे कम पैसों से शुरू किया जा सकता
है और इससे अच्छी आमदनी भी हो सकती है साथ ही आप दूसरों को रोजगार भी दे सकते
हैं।
Tuesday, September 28, 2010
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