Tuesday, January 18, 2011

सौंदर्य की दुनिया में निखारें अपना भविष्य

ब्यूटी वल्ड में युवाओं के लिए अपार संभावनाएं हैं। पहले इस
क्षेत्र को लड़कियों के लिए ही माना जाता था पर अब
लोगों की सोच बदली है। इसके अलावा यह एक ऐसा क्षेत्र भी है जिसे कम खर्च में शुरू
किया जा सकता है और इसे व्यापार के तौर पर शुरू कर सकते
इमरान
खान

आज जिंदगी की
भागदौड़ में हर कोई सुंदर और स्मार्ट दिखना
चाहता है। दूसरों से हटकर दिखने की चाह में युवा सुंदर दिखने के लिए किसी भी हद तक
जाने को तैयार हैं। इसी कारण भारत में ब्यूटी इंडस्ट्री तेजी से ग्रोथ कर रही है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय ब्यूटी बिजनेस लगभग 11 हजार करोड़ तक पहुंच चुका है।
मार्केट के जानकारों का अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में यह इंडस्ट्री 30-35 फीसद
की रफ्तार से आगे बढ़ रही है। अगर हम भारतीय ब्यूटी इंडस्ट्री की बात करें तो यह
लगभग 4580 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है।
क्या है कॉस्मेटोलॉजी-
आजकल युवाओं में कॉस्मेटोलॉजी के प्रति दीवानगी काफी बढ़ रही है। इसका एक कारण यह
भी है कि आज के फैशन व ग्लैमर वल्र्ड में कॉस्मेटोलॉजिस्ट की डिमांड काफी बढ़ गई
है। कॉस्मेटोलॉजिस्ट वह व्यक्ति होता है जिसे फैशन के बारे में पूरी जानकारी होती
है। अब इस क्षेत्र में पुरुष भी आने लगे हैं पर लड़कियां अभी भी इसे ड्रीम करियर के
तौर पर ही देखती हैं।
कॉस्टमेटोलॉजिस्ट का कार्य- कॉस्मेटोलॉजी
में ब्यूटी थैरेपी से लेकर हेल्थ केयर तक सब कुछ जुड़ा होता है। इसमें व्यक्ति के
शरीर, चेहरे और बालों आदि पर काम करके व्यक्ति की सुंदरता को और निखारा जाता है। एक
ब्यूटीशियन का काम अपने ग्राहकों के लुक व एपियरेंस को आकर्षक बनाना, हेयर स्टाइल,
त्वचा की देखभाल, मेनीक्योर आदि का ध्यान रखना है।
योग्यता- एक
मेडिकल कॉस्मेटोलॉजिस्ट या कॉस्मेटिक डर्मेटालॉजिस्ट बनने के लिए आपके पास एमबीबीएस
के बाद डर्मेटालॉजी में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री (एमडी या डिप्लोमा/डीएनबी) होना
चाहिए। हालांकि नॉन मेडिकल कॉस्मेटोलॉजिस्ट बनने के लिए किसी खास प्रोफेशनल डिग्री
की जरूरत नहीं होती। जिन लोगों की इस क्षेत्र में खास दिलचस्पी है और ब्यूटी केयर
में करियर बनाना चाहते हैं वो स्कूल खत्म होने के बाद भी इसे अपना सकते हैं। एक
ब्यूटीशियन को इस क्षेत्र से जुड़ी प्रैक्टिकल नॉलेज होनी जरूरी है। इस प्रोफेशन
में समय और अनुभव के साथ आपकी कला में निखार आता है। अगर आप जल्द से जल्द ब्यूटी
वल्र्ड में प्रवेश करना चाहते हैं तो शार्ट टर्म कोर्स आपके लिए सही
होगा।
पर्सनल स्किल- ब्यूटी वल्र्ड में करियर बनाने के लिए
जरूरी है कि आपमें लोगों को खूबसूरत बनाने की काबलियत होनी चाहिए। इसके साथ ही आपको
क्रियटिव सोच होना भी बेहद जरूरी है। इसके अलावा बिजनेस की अच्छी समझ और खुद की कला
को बेहतर तरीके से प्रकट करने की खूबी भी होनी चाहिए। ब्यूटीशियन बनने के लिए एक और
जरूरी बात यह है कि आप ब्यूटी सर्किट में आ रहे नए-नए रुझानों के प्रति खुद को
लगातार अपडेट करते रहें। ब्यूटीशियन को फ्रेंडली, मिलनसार और आत्मविश्वासी भी होना
चाहिए। सोच समझकर चुनेंकई बार युवा सिर्फ कमाई या बड़े नाम के आकर्षण की वजह से गलत
करियर का चुनाव कर लेते हैं। यदि आप सजने-सजाने के शौकीन हैं, तभी इस करियर का
चुनाव करें। कभी भी दूसरों की सुनी-सुनाई बातों पर ध्यान न दें। इससे आप न केवल
परेशान हो सकते हैं, बल्कि अपने काम को भी ठीक ढंग से अंजाम नहीं दे
सकते।
रोजगार के मौके- इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को
कॉस्मेटिक उत्पाद निर्मित करने वाली कंपनियों में नौकरी मिल सकती है। खासकर इन
कंपनियों में आप बतौर ब्यूटी एग्जिक्यूटिव, कॉस्मेटोलॉजिस्ट व ब्यूटी एडवाइजर के
तौर पर करियर की शुरुआत कर सकते हैं। कॉस्मेटोलॉजी के विशिष्ट क्षेत्रों मसलन
हेयरस्टाइलिंग, स्किन केयर, कॉस्मेटिक्स, मेनीक्योर/पेडीक्योर तथा इलेक्ट्रोलॉजी से
संबंधित क्षेत्र में कई तरह के रोजगार उपलब्ध हो सकते हैं। ब्यूटी सैलून, स्पा,
रिसॉर्ट और होटल इत्यादि में भी आप कॉस्मेटोलॉजिस्ट बनने के बाद रोजगार पा सकते
हैं। अनुभवी कॉस्मेटोलॉजिस्ट और खासकर मेकअप आर्टिस्ट्स और हेयर स्टाइलिस्ट्स की
फैशन, एडवरटाइजिंग, फिल्म, टेलीविजन और थिएटर इंडस्ट्री में जबरदस्त मांग है। आप
चाहें तो किसी हेल्थ क्लब या इससे जुड़े किसी क्षेत्र में बतौर इंस्ट्रक्टर भी
नियुक्त हो सकते हैं या कॉस्मेटोलॉजी स्कूल में पढ़ा भी सकते हैं। अखबार,
पत्र-पत्रिकाओं और वेब पब्लिकेशंस के लिए भी बतौर सलाहकार काम किया जा सकता
है।
सैलरी पैकेज- यदि आप अपने करियर की शुरुआत किसी ब्यूटी
पार्लर से करते हैं तो शुरुआती दौर में आप प्रति माह 5000 से 8000 रुपये कमा सकते
हैं। शादी-विवाह के सीजन में तो आप कई गुना ज्यादा कमाई कर सकते हैं। एडवरटाइजिंग
कैंपेन की खातिर मेकअप और हेयर ड्रेसिंग के लिए आप एक दिन में 1500 से 2000 रुपये
आसानी से कमा सकते हैं।
पार्लर तो है ही-
कॉरपोरेट पार्टियों, किटीज पार्टियों, वैवाहिक, सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लेने
वाले लोगों द्वारा ब्यूटी पार्लरों में जाने की बढ़ते चलन के कारण ब्यूटी पार्लरों
का मार्केट बढ़ता जा रहा है। इनमें कॉस्मेटोलॉजिस्ट को अच्छे अवसर प्राप्त हो रहे
हैं। स्वयं का ब्यूटी पार्लर खोलकर भी अच्छी कमाई की जा सकती है। इन ब्यूटी
पार्लरों में अन्य इच्छुक लोगों को प्रशिक्षण देकर भी कमाई की जा सकती है। वर्तमान
में गली-मोहल्लों से लेकर फाइव स्टार होटलों तक ब्यूटी पार्लर के ग्राहक मिल जाते
हैं। ब्यूटी प्रशिक्षण संस्थानों में भी प्रशिक्षकों के रूप में कॉस्मेटोलॉजिस्ट को
रोजगार मिल जाता है। हेल्थ सेंटरों में भी कॉस्मेटोलॉजिस्ट को कंसल्टेंट के रूप में
काम मिलता है। अखबारों, मैगजीनों, टीवी चैनलों, वेबसाइटों के लिए भी
कॉस्मेटोलॉजिस्ट कंसल्टेंट के रूप में नियुक्त किए जा रहे हैं। लाइफ स्टाइल
मैगजीनों के लिए तो कॉस्मेटोलॉजिस्ट कंटेंट मुहैया कराने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाते हैं। कॉस्मेटोलॉजिस्ट के रूप में अगर आपने नाम कमा लिया तो धन एवं शोहरत
आपके कदमों में होगी।
छोटे से भी कर सकते हैं शुरुआत- सात
सालों से ब्यूटी एरोमा नामक बुटीक चला रही सीमा बताती हैं कि अगर युवा खासकर
लड़कियां इसको प्रोफेशन के तौर पर अपनाना चाहती हैं तो उनके भविष्य के लिए काफी
अच्छा रहेगा। जो इस फील्ड में रोजगार पाना चाहते हैं उन्हें कम से कम एक साल की
ट्रेनिंग लेनी चाहिए। युवा कोई शॉट टर्म कोर्स करने के बाद भी इस फिल्ड में करियर
बना सकते हैं। अगर वो किसी पार्लर में ही काम सिख कर शुरुआत करना चाहते हैं तो वो
भी बुरा नहीं है।
महिलाओं के लिए अच्छा ऑप्शन- महिलाएं पार्लर
खोलकर अपने घर से ही रोजगार शुरू कर सकती हैं। लगभग 25 से 30 हजार में छोटा पार्लर
खोलकर महिलाएं अपने लिए तो रोजगार शुरू कर ही सकती हैं, साथ ही परिवार का सहारा भी
बन सकती हैं।
ब्यूटी इंस्टीट्यूट्स- Women’s Training
Institute, Bangla Saheb Lane, New Delhi, http://www.worldywca.org/ Women’s
Polytechnic, Maharani Bagh, New Delhi – 110065 Akbar Peerbhoy, Girl’s
Polytechnic Fort, Mumbai - 400001 mAmity University, Sector 125, Noida, http://www.amity.edu/ Shahnaz Hussain’s Woman’s
World, International Institute of Beauty, M-106, Greater Kailash – 1; New Delhi
– 110048, http://www.shah/ naz- husain.com mVLCC
Inst itute of Beauty, Health and Manag ement, www. vlcc insti tute. com mWomen’s
Polyt echnic, Maharani Bagh, New Delhi

Monday, January 17, 2011

लहराया पश्चिमी यूपी का परचम


जिनमें जीतने
का जज्बा और कुछ
कर गुजरने का माद्दा
होता है उन्हें फर्क
नहीं पड़ता परिस्थितियों से।
वो तब तक संघर्ष
करते हैं जब तक
नहीं मिलता सही मुकाम
उन्हें। पश्चिमी उत्तर प्रदेश
से भी ऐसे कई
खिलाड़ी निकले
जिन्होंने अपने दम पर
अपना और अपने क्षेत्र
का नाम दुनिया में
चमकाया।
इमरान खान

अपने पहले टेस्ट में शतक जमाने वाले सुरेश रैना
को भविष्य का कप्तान माना जा रहा है। सौरभ गांगुली और
उनमें कई समानताएं खोजी जा रही हैं और हमेशा से लडख़ड़ाते रहे भारतीय मध्यक्रम को
संभालने का माद्दा भी इस खिलाड़ी में देखा जा रहा है। रैना को ये तारीफें देश के हर
कोने से मिल रही हैं और उनके अपने क्षेत्र पश्चिमी यूपी के लिए यह 'अपने लड़के' की
कामयाबी का परचम है, जिसके झोंकों में पश्चिमी यूपी का मान छुपा है। टेस्ट में
सैकड़ा ठोकते ही रैना भारत के 12वें ऐसे टेस्ट खिलाड़ी बनें जिसने पहले ही मैच में
शतक लगाया हो और देश के एकमात्र और दुनिया के ऐसे चौथे खिलाड़ी बन गए जो ट्वंटी-20,
वनडे और टेस्ट यानि क्रिकेट के तीनों फॉरमेट में फिट बैठते हैं। इसके अलावा रैना ने
भारत की तरफ से क्रिकेट के तीनों फार्मेट में सैकड़ा जडऩे का भी इतिहास रच दिया
है।
क्रिकेट में पश्चिमी यूपी का एक और नाम जो बहुत चमका वो नाम है परवीन कुमार
का। 2 अक्तूबर 1986 को मेरठ में पैदा हुए परवीन दाएं हाथ के मध्यम गति के गेंदबाज
हैं और गेंद को दोनों तरफ स्विंग करवाने का माद्दा रखते हैं। 2004 में अपने फस्र्ट
क्लास कॅरियर की शुरुआत करने वाले परवीन ने 25 मैचों में 126 विकेट लेकर 21.50 की
औसत से विकेट चटकाए। आईपीएल में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर की तरफ से खेलकर परवीन ने
ट्वंटी-20 में भी अपना दम दिखाया। परवीन फिलहाल शादी करने वाले हैं और अपना
रेस्टोरेंट खोलना चाहते हैं।
क्रिकेट के अलावा पहलवानी में भी पश्चिमी यूपी का
कोई तोड़ नहीं। बागपत के गांव मलकपुर के पहलवान राजीव तोमर ने अपने गांव के नाम में
चार चांद लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गांव मलकपुर की मिट्टी में पले बढ़े राजीव
तोमर को इस साल अर्जुन अवार्ड पुरस्कार से भी नवाजा जाएगा। इससे पहले भी राजीव के
नाम यश भारती अवार्ड, राजीव गांधी खेल रत्न, राष्ट्र खेलों में दो बार गोल्ड और एक
सिल्वर मेडल समेत राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेडलों की लंबी लिस्ट है।
इसके अलावा वह 35 बार हिंद केसरी और भारत केसरी खिताब से भी नवाजे जा चुके हैं। सन
1995 में गांधीनगर गुजरात में हुई कुश्ती प्रतियोगिता से अपने कॅरियर की शुरुआत
करने वाले राजीव तोमर अर्जुन अवार्ड दिए जाने की घोषणा से काफी खुश हैं। उनका कहना
है कि पिता श्याम सिंह तोमर की प्रेरणा और गांव के कोच रहे इकबाल सिंह के मार्ग
दर्शन का ही नतीजा है कि वह इस मुकाम तक पहुंचे। फिलहाल वह दिल्ली के गुरु हनुमान
अखाड़े में रहकर तैयारी करते हैं और रेलवे में सीटीआई के पद पर कार्यरत हैं। गांव
मलकपुर कि एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि इस गांव को राजीव के रुप में चौथा अर्जुन
अवार्डी मिला है। इससे पहले 1987 में पहलवान सुभाष तोमर, 1999 में शूटर विवेक तोमर,
2004 में पहलवान शौकेंद्र तोमर भी अर्जुन अवार्ड से नवाजे जा चुके हैं। यही नहीं
पहलवानों का गांव कहे जाने वाले इस गांव के घर-घर में भविष्य के अर्जुन अवार्डी
तैयार हो रहे हैं। यही कारण है इस गांव में करीब दो सौ ऐसे पहलवान हैं,जो राष्ट्रीय
और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता के परचम लहरा चुके हैं।
क्रिकेट और पहलवानी के
अलावा पश्चिमी यूपी के निशानेबाज भी अचूक निशाना साधने में माहिर हैं। बागपत के
गांव जौहड़ी की रहने वाली निशानेबाज सीमा तोमर ने बीजिंग में सिल्वर मैडल जीतकर
पश्चिमी यूपी को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ख्याति दिलाई है। सीमा की मां प्रकाशी देवी
भी शूटर है और सीमा ने अपने गांव में ही शूटिंग के गुर सीखे हैं। सीमा को पूरा
भरोसा है कि वह अक्टूबर में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जरूर जीतेगी। वह
मानती हैं कि परिवार के सहयोग के बिना वह शॉटगन में इस मुकाम तक नहीं पहुँच पाती
क्योंकि यह काफी मुश्किल था। राष्ट्रीय चैम्पियनशिप और जयपुर, कजाखस्तान के अलमांटी
और बैंकाक में एशियाई क्ले स्पर्धा में पदक जीत चुकी सीमा के मुताबिक उसे अच्छा
प्रदर्शन करने की प्रेरणा मेरी माँ (प्रकाशी) से मिलती है जो खुद राष्ट्रीय स्तर की
निशानेबाज रह चुकी हैं।

महंगाई के कारण गर्क हो रहा जीवन

देश के ट्रेड यूनियन आंदोलन में आज अमरजीत
कौर
एक जाना पहचाना नाम है। वे एटक की महासचिव हैं।
उन्होंने
एक कदम आगे के संवाददाता इमरान खान से तमाम विषयों पर बहुत खुलकर
बात की। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश
पंजाब में आप कहां से
हैं?

मेरी पैदाइश गुरदासपुर जिले की है। तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई मैंने
वहीं की है, फिर हम दिल्ली आ गए थे। कालेज की पढ़ाई मैंने दिल्ली युनिवर्सिटी से की
है। मेरी शादी पंजाब में हुई उसके बाद से मैं पंजाब और दिल्ली दोनों जगह रहती
हूं।
पढ़ाई के दौरान आप छात्र संगठनों से जुड़ गई थीं?
दरअसल मेरे पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। उनसे मैंने आजादी आंदोलन के
बारे में काफी कुछ सीखा। इसके अलावा और भी आन्दोलनकारियों के जीवन को बचपन में ही
बहुत नजदीकी से देखा। उनके साहस, साफगोई, और इमानदारी ने मेरे अन्दर सामाजिक कामों
के प्रति आकर्षण पैदा किया। इससे के बाद मेरा झुकाव क्रांतिकारी किताबें पढऩे की ओर
हुआ। ऐसे परिवेश ने मुझे शुरू से ही क्रांतिकारी बना दिया। उसी समय से देश के लिए
कुछ करने का जज्बा पैदा हुआ। लोगों के काम आना, देश की सेवा करना, ये सोच शुरू हुई।
नतीजे के तौर पर स्कूल के समय से ही मैंने काम शुरू कर दिया था। जब मैं दसवीं कक्षा
में पढ़ती थी तो मेरी लीडरशिप में पहली हड़ताल हुई। लड़कियों का स्कूल था। उस एक
हड़ताल ने मुझे काफी कुछ सिखाया। शुरू से ही संघर्षों से जुडऩे के बाद बहुत सी
स्टूडेंट संगठनों ने मुझे अपने साथ जोडऩा चाहा मगर मेरा झुकाव उस तरफ था जो
किसानों, मजदूरों और गरीबों को मदद करता है। उसी समय से मैं कम्युनिस्ट विचारधारा
की तरफ आकर्षित हुई।
ट्रेड यूनियन में एक कार्यकर्ता के तौर पर जुड़ीं
या सीधा आपको पद दिया गया?
युनिवर्सिटी की पढ़ाई के दौरान ही मेरा
झुकाव महिलाओं व मजदूरों की तरफ बढ़ गया था। 1986 में जब मैंने स्टूडेंट आंदोलन से
रिटायरमेंट लेने के बाद मैं पूरी तरह से ट्रेड यूनियन और महिला आंदोलन से जुड़ गई।
शुरू में तो एक कार्यकर्ता के तौर पर ही जुड़ी थी। पूरे प्रोसेस को कंप्लीट करने के
बाद ही आप एक आर्गेनाइजर के रुप में मर्ज होते हैं। पहले ऐक्टिविस्ट फिर आरगेनाइजर
उसके बाद मुझे जिम्मेदारी दी गई कि मैं किसी सेक्शन को आरगेनाइज करूं। उसके बाद
मुझे महिला आंदोलन की लीडरशिप भी मिली और फिर ट्रेड यूनियन की स्टेट बॉडी की
लीडरशिप में भी शामिल किया गया। 1994 में मैं ऐटक की नेशनल सेक्रेटरी बनी। उसके बाद
मुझे चाइल्ड लेबर का भी चार्ज दिया गया। मैं दिल्ली स्टेट की पार्टी सेक्रेटरी हूं।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की टाप बॉडी में भी हूं।
इतने काम में
तालमेल कैसे बैठाती हैं?

जब दिल में किसी के लिए कुछ करने का जुनून हो
तो सब हो जाता है। ट्रेड यूनियन एक वर्किंग क्लास मूवमैंट है और कम्युनिस्ट आंदोलन
एक वर्किंग क्लास पॉलिटिक्स। विचार आपको ताकत देते हंै कि वर्करों के अधिकारों के
लिए लडऩा है फिर आपकी चैरिटी की सोच नहीं रहती।
माक्र्सवादी विचारधारा
के हमारे देश में इतने संगठन हैं, क्या इनको एक प्लेटफार्म पर नहीं लाया जा
सकता?

देखिए, माक्र्सवाद की विचारधारा है तो एक ही, पर जब हिंदुस्तान
में इसको अप्लाई करने की बात आती है तो उसमें सबकी सोच अलग-अलग है। देश यही है, लोग
यही है, पर देश का विकास कहां हैं, देश की विभिन्नताएं कैसी है, मान्यताएं कैसी हैं
यह एक अलग बात है। मंहगाई के मुद्दे पर हम एक हैं, गरीबों के हक की लड़ाई के
मुद्दों पर हम एक हैं। सत्ता में कैसे आना है, सत्ता में मजदूरों का कैसे बोलबाला
हो सिर्फ इसी सोच में फर्क है। लेकिन जहां सोच में फर्क हैं मुझे लगता है वहां भी
प्रयास करना चाहिए। पिछले साल से हम लगातार कोशिश कर रहे हैं कि सभी ट्रेड यूनियन
को एक प्लेटफार्म पर लाएं।
सरकार दिन प्रतिदिन महंगाई बढ़ा रही है, इस
पर क्या कहेंगी?

सरकार बेतहाशा महंगाई बढ़ा रही है। पार्टियों के विरोध
के बाद भी सरकार बेशर्मी से महंगाई बढ़ा रही हैं। लोगों की आमदनी तो कम हो रही है
क्योंकि सरकार उनकी जेबों पर टैक्स लगा रही है। इससे जीवन स्तर स्तर गिर रहा हैं।
महंगाई ने आम जनता का जीवन गर्क कर दिया है।
मजदूरों के लिए जो एनजीओ
काम कर रहे हैं पैसा वो पूंजीपति देशों से लेते हैं और साम्राज्यवाद के नाम पर
उन्हीं के खिलाफ बोलते हैं। आपकी क्या राय है?

अगर कोई अमेरिका,
ब्रिटेन से पैसा ले रहा है और फिर सम्राज्यवाद का विरोध कर रहा है तो ये दोगली नीति
है। आप देखिए जो एनजीओ विदेशी पैसे से काम कर रहे हैं उनका एजेंडा हर छह महीने पर
बदलता रहता है। जो फंड गिवर है वो ही एजेंडा तय करता है। अगर पैसे देने वाला ही
एजेंडा तय करेगा तो ना मजदूर आंदोलन आगे बढ़ाया जा सकता है, ना ही किसान
आंदोलन।
सीपीआई और जनसंघ एक ही समय में बनें। माक्र्सवाद की सही
विचारधारा होने के बावजूद सीपीआई का आधार सिकुड़ता गया जबकि साम्प्रदायिक ताकतें
देश में नंगा नाच कर रही हैं? ऐसा क्यों हो रहा है?
1925 में जब
सामाजिक, आर्थिक परिवर्तन की सोच रखने वाली पार्टी जब अस्तित्व में आई तो उसी समय
प्रतिक्रांतिवादी और हिटलर के फांसीवाद से प्रेरणा लेने वाली जनसंघ का जन्म हुआ। आज
वही काम आरएसएस कर रही है। आरएसएस हजारों साल से चल रहे अन्धविश्वास को आगे बढ़ाने
का काम कर रही है। क्रान्तिकारी ताकतों के खिलाफ एक जमीन यहां पहले से मौजूद है।
इसी जमीन पर आरएसएस जैसे संगठन खड़े होते हैं। ऐसे संगठन पूंजीवाद के लिए
विचारधात्मक खाद पानी मुहैया करवाते हैं। आरएसएस जैसे संगठनों की सोच गैर वैज्ञानिक
है, जो जातिवाद और अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं। हमको इन सबके विरुद्ध खड़े होना
है। हमने देश को आजाद कराने के बाद कैसा समाज बनाना है उस लड़ाई को शुरू किया।
अंग्रेज जब हमें दो हिस्सों में बांटना चाहते थे तो आरएसएस ने हिंदूवाद के नाम पर
उसमें अहम भूमिका निभाई। नतीजे के तौर पर गांधी जी की हत्या हुई। देश आजाद होने के
बाद से वामपंथी लोग मजदूरों के लिए लड़ रहे हैं, और देश के लोगों को
आहिस्ता-आहिस्ता समाजवाद की तरफ भी मोड़ रहे हैं। समाज में मौजूद गंदगी को बढ़ाना
मुश्किल नहीं है उसको हटाकर नए रास्ते बनाना मुश्किल है। हम एमएलए और एमपी की लड़ाई
में बहुत पीछे रह गए मगर देश के सामाजिक, आर्थिक ढांचे के अंदर लोगों के लिए जगह
बनाने की लड़ाई में हमें कामयाबी मिली है। कम्युनिस्ट आंदोलन के तेजी से न बढऩे का
एक कारण उसका बिखराव भी है। सीपीआई से कुछ लोगों ने सीपीएम बना ली फिर सीपीएम से
नक्सलवाड़ी के बाद सीपीआई एमएल बन गयी। उनमें से कुछ लोगों ने बाद में हथियारबन्द
लड़ाई शुरू कर दी, आज भी उन्होंने जंगलों को नहीं छोड़ा है वे आज भी लड़ रहे हैं।
उन्हें आप माओवादी के रुप में जानते हैं। वे अपने रास्ते से भटक गये हैं। इन्हीं सब
कारणों से हम कमजोर हुए। जो मालेगांव में हुआ है, जो गुजरात में हुआ है, जो
राजस्थान के अंदर बम विस्फोट हुआ है जिसमें सीधे-सीधे हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियों
का हाथ है। ऐसे मसलों को उठाया ही नहीं जाता। आखिर क्यों? किसी आतंकवादी का कोई
धर्म नहीं होता है। भाजपा और उसके दूसरे आनुषांगिक संगठन अमेरिका की भाषा बोलते
हैं। वे सारे मुस्लिमों को ही आतंकवादी बता देते हैं। बहुत लम्बे समय तक उन्होंने
आरएसएस के माध्यम यह जहर समाज में घोला है। आज वे उसकी फसल काटने का काम कर रहे
हैं।
आपकी पार्टी के अलावा भी बहुत सी पार्टियां व संगठन मजदूरों के हक
के लिए लड़ रहे हैं। बात इमानदारी या बेइमानी की नहीं है, पर आप उनसे अलग कैसे
हैं?
मजदूरों के छोटे-मोटे हकों के लिए तो सभी लड़ रहे हैं पर हमारा
लक्ष्य मजदूरों को सत्ता में लाना है। यही फर्क है उनमें और हममें। हम मजदूरों की
भागीदारी सत्ता में बढ़ाना चाहते हैं जो पूंजीवाद के खात्मे के बाद ही होगी। इसके
बाद ही किसान खुशहाल हो सकेगा।
क्या समाजवाद सिर्फ आर्थिक लड़ाइयां लडऩे
से ही आएगा?

नहीं, ऐसा नहीं है। आर्थिक लड़ाइयां पूरी लड़ाई का सिर्फ
एक पहलू हैं। सोच की भी लड़ाई है। इसलिए सांस्कृतिक लड़ाइयां भी जरूरी हैं। सामाजिक
परिवर्तनों की लड़ाइयां भी जरूरी हैं। आधी आबादी महिलाओं की है। अगर महिला की
भागीदारी सियासत में करनी है और समाजवाद लाना है तो इस आधी आबादी की भागीदारी कैसे
होगी, उसकी जिंदगी के लिए भी जो बराबरी के आयाम है उसकी लड़ाई लडऩी
होगी।
इलेक्शन के समय आपकी पार्टी भी विद्यार्थियों और मजदूरों को
प्रचार के लिए लगाती हैं। आप इसे कहां तक ठीक मानती हैं?

प्रचार में तो
सबको लगना ही चाहिए। जब चुनाव आता है तो चुनाव की प्रक्रिया में तो सभी को शामिल
होना चाहिए। हम यह तो नहीं कहते कि हम जनवादी चुनावी प्रक्रिया को नहीं मानते, मगर
ऐसा नहीं है। इसलिए जब चुनाव की प्रक्रिया होगी तो हम सबको ही कहेंगे कि चुनाव में
उतरें।
जब आप पिछड़ीं महिलाओं के बीच काम करती हैं तो आपको क्या
परेशानियां आती हैं?

देखिए, परेशानी तो होगी ही क्योंकि अशिक्षा बहुत
है, अज्ञानता बहुत है। देश के हालात बहुत खराब हैं। दूर-दराज के इलाकों में जाकर
कहना, कि तुम संगठित हो जाओ और लड़ लो, बहुत मुश्किल है। हम तो कह कर आ जाएंगे, पर
जो महिलाएं चारों तरफ से अपने विरोधियों से घिरी हैं, जो देख रही हैं कि इलाके की
पुलिस भी गुंडों को सलाम करती है, उस महिला को हम सिर्फ प्रवचन दे कर चले आएं ये
सही नहीं है। इसलिए जो दबे हुए हिस्से हैं उनमें साहस पैदा करना, उन्हें बताना कि
तुम अकेले-अकेले नहीं लड़ सकते हो, तुम्हें संगठित होना ही होगा। जो समाजवाद लाने
की बात करते हैं उनकों महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करनी ही होगी। ट्रेड यूनियन की
आर्थिक लड़ाई सामाजिक लड़ाई में परिवर्तित तभी होगी एक आंदोलन दूसरे आंदोलन की
महत्ता समझेगा।
मजदूर संगठन में जब पुरुष और महिला साथ काम करते हैं तो
क्या पुरुष मजदूरों की पुरुषवादी सोच काम में रुकावट बनती है?

पुरुष
प्रधान समाज की पुरुषवादी सोच तो सब जगह आती है। चाहे आप वर्किंग क्लास पॉलिटिक्स
करें या मिडल क्लास की। आपको अपने आप को डी क्लास करना होगा। जो पुरुषप्रधान समाज
की सोच हमारे संस्कारों, रीति रिवाजों और त्योहारों में बसी हुई है। हमारी रोजमर्रा
की भाषा में घुसी हुई है। वो हमें परिवार की परवरिश से मिलती है। इसके खिलाफ चौतरफा
लड़ाई लडऩी होगी।
मजदूरों के हकों के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, उनसे
ज्यादा काम करवाया जाता है, ओवर टाइम नहीं मिलता। उसके बारे में आपका संगठन क्या कर
रहा हैं?
हां, ये समस्या तो देश में बहुत बड़े पैमाने पर है। मजदूरों
से 12 से 14 घंटे तक काम लिया जा रहा है। श्रम कानून का सीधे-सीधे उल्लघंन हो रहा
है। असंगठित क्षेत्र में तो यह 100 फीसद है। संगठित क्षेत्र में जो गर्वमेंट सेक्टर
है, वहां भी सरकार ठेके पर काम दे रही है। उनसे ज्यादा काम करवाया जा रहा है। जब
सरकार ही कानूनों का उल्लंघन कर रही है तो पब्लिक सेक्टर में तो होगा ही। इस पर
ट्रेड यूनियन लड़ रही है। सरकार हमें लडऩें भी कहां दे रही है। सरकार तो यूनियन
बनाने का ही विरोध कर रही है। यूनियन बनाना जो कानूनी तौर पर हमारा अधिकार है वही
हमसे छीना जा रहा है, तो हम सरकार से और क्या उम्मीद कर सकते हैं।
सरकार
तेजी से विभागों का निजीकरण कर रही है। इसके बारे में क्या
कहेंगी?

सरकार ने क्लास फोर तो खत्म ही कर दिया है। सारा काम ठेके पर
दे दिया है। कालेजों में, सरकारी दफ्तरों में कहीं भी देखिए क्लास फोर का काम ठेके
पर दे दिया गया है। सरकार की पूंजीवादी सोच का ही यह नतीजा है। सरकार अपना मुनाफा
कम नहीं करना चाहती बल्कि गरीबों का हक मारने पर तूली हुई है।

Saturday, January 15, 2011

फुटबाल : प्रतिभा है पर रास्ता नहीं

एक तरफ सारी दुनिया पर फुटबाल का बुखार है तो दूसरी तरफ दिन रात
पसीना बहाते हमारे खिलाड़ी। फुटबाल खेलने के
लिए जोश, फुर्ती और मजबूत शरीर की जरूरत होती है जो कि भारत के खिलाडिय़ों में
प्र्याप्त है। फुटबाल को लेकर लोगों की दीवानगी भी कम नहीं है। फिर आखिर क्या वजह
है कि इतने महत्वपूर्ण खेल के प्रति हमारे खेल संस्थान और सरकारों का रवैया बहुत ही
बेरूखी भरा है। जिससे हम फुटबाल की दुनिया में 132वें पायदान पर हैं। कौन है इसका
जिम्मेदार? और क्या इसकी सूरत बदली जा सकती है? फुटबाल के अहम पहलुओं पर नजर डालती
इमरान खान की एक रिपोर्ट
एक अरब से ज्यादा की आबादी और एशिया
महाद्वीप की ताकत समझे जाने वाले भारत का विश्व कप फुटबाल में 132वां स्थान क्यों
हैं? फुटबाल के लिए हमें जिन चीजों की जरूरत है वो सब है हमारे पास, फिर हम दुनिया
के बाकी देशों के बराबर क्यों नहीं खड़े हो पा रहे हैं?
शारीरिक क्षमता
:
फुटबाल के खिलाडिय़ों मेंताकत, जोश और फुर्ती होनी जरुरी है। यह सब
खूबियां हमारे खिलाडिय़ों में मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश, उतरांखड, बंगाल या फिर पंजाब
के खिलाड़ी अपने खेल कौशल के लिए पहले ही मशहूर हैं। उनके जोश और फुर्ती के सामने
बड़े -बड़े पानी भरते हैं। फुटबाल खेलने के लिए टीम भावना भी सबसे अहम है। वो भी
हमारे खिलाडिय़ों में कूट-कूट कर भरी हैं। जहां तक सामूहिक भावना का सवाल है तो वह
भी हमारे समाज का काफी लम्बे अर्से से हिस्सा रहा है। सारी खूबियां मौजूद है हमारे
खिलाडिय़ों में। लेकिन यह अजीबोगरीब संयोग है कि हमारे यहां वन मैन गेम क्रिकेट को
ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है जबकि फुटबाल की स्थिति दोयम दर्जे की
है।
खेल के मैदान : फुटबाल खेलने के लिए क्रिकेट की तरह न
बढिय़ा पिच की जरूरत है और ना ही हॉकी की तरह अच्छे कोर्ट की। इसके लिए तो सिर्फ
समतल मैदान की काफी है। जो यूपी, मध्यप्रदेश और पंजाब में प्र्याप्त है। उत्तराखंड
पहाड़ी प्रदेश होने के बावजूद वहां का बच्चा-बच्चा फुटबाल का दीवाना है। इसके
बावजूद हम फुटबाल में कोई कीर्तिमान नहीं स्थापित कर रहे हैं। यूपी और पंजाब की
मिट्टी भी ऐसी है जिससे फुटबाल के लिए अच्छे खेल के मैदान बनाए जा सकते हैं पर
जरूरत है ध्यान देने की।
जरूरत है स्पांसरों की : अगर सरकार
फुटबाल को प्रमोट करे तो स्पांसरों की भी कमी नहीं रहेगी। दूसरे खिलाडिय़ों की तुलना
में फुटबाल के खिलाडिय़ों को बहुत कम पैसा दिया जाता है। स्पांसर अन्य खेलों पर तो
पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं पर फुटबाल में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा क्योंकि
सरकार ही फुटबाल के साथ भेदभाव कर रही है। सरकार को चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा
फुटबाल एकेडमियां खोलकर खिलाडिय़ों को प्लेटफार्म दे जिससे उनकी खेल क्षमता तो
निखरेगी ही देश को भी फुटबाल के अच्छे खिलाड़ी मिल सकेंगे। घर रहकर खिलाड़ी
प्रैक्टिस पर उतना समय नहीं दे पाते जितना आवश्यक है। एकेडमियों में खेलने वाले
खिलाड़ी दूसरे खिलाडिय़ों के मुकाबले ज्यादा तेज होतें हैं। खिलाडिय़ों को सामाजिक
सुरक्षा का डर भी है। फुटबाल के खिलाडिय़ों को आसानी से अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती
जिससे उनमें सामाजिक असुरक्षा का भी खतरा रहता है। यह भी एक अहम पहलू है कि देश को
अच्छे फुटबाल खिलाड़ी नहीं मिल रहे।
फीफा के लिए कर चुके हैं क्वालीफाई
:
आज फुटबाल जगत में भारत की हालत जैसी भी है। इस खेल से हमारा एक
ऐतिहासिक रिश्ता है और इसी रिश्ते की वजह से भारतीय टीम ने वर्ष 1950 के फीफा विश्व
कप के लिए क्वालीफाई किया था। हालांकि भारतीय टीम वहां नहीं गई, क्योंकि भारतीय
खिलाड़ी जूता पहनकर खेलने के आदी नहीं थे, जबकि फीफा के नियमों के तहत नंगे पांव
फुटबाल नहीं खेला जा सकता था। इस पहलू पर भी विचार की जरूरत है।
मां-बाप
को भी बदलनी होगी सोच :
मां-बाप भी अपनी सोच बदलें और अपने बच्चे को
फुटबाल खेलने के लिए प्रेरित करें ताकि भारत को फुटबाल के अच्छे खिलाड़ी मिल सकें।
भारत का हरेक पिता अपने बच्चे को सचिन ही बनाना चाहता है, कोई फुटबाल की ओर ध्यान
ही नहीं दे रहा। अगर मां-बाप अपने सोचने का तरीका बदलें और बच्चों की रुचि फुटबाल
में बढ़ाएं तो हमें भी फुटबाल में आगे जाने से कोई नहीं रोक
सकता।
टूर्नामेंटों की है कमी : देश के लिए नेशनल लेवल के
टूर्नामेंट खेल चुके प्रहलाद सिंह रावत कहते हैं कि अन्य खेलों की तरह फुटबाल के भी
कई राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट होने चाहिए ताकि खिलाड़ी ज्यादा से ज्यादा मैच
खेलें जिससे उनके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हो। फुटबाल के नाम पर हमारे पास कुछ गिने
चुने ही राष्ट्रीय टूर्नामेंट हैं इसका कारण यही है कि फुटबाल में लोगों की
दिलचस्पी कम है जिससे लोग इसमें पैसा नहीं लगा रहे। उन्होंने बताया कि यूपी, दिल्ली
और पंजाब में ऐसी एकेडमियों की कमी है जो ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ी भर्ती करके उनको
ट्रेनिंग और अन्य सुविधाएं मुहैया करवा सकें। सब तो क्रिकेट खेल नहीं सकते इसलिए
हमें फुटबाल के खिलाडिय़ों की भी जरूरत है। फुटबाल मेहनत का खेल है इसके लिए कड़े
अभ्यास की जरूरत है। इसके लिए खिलाडिय़ों को कम से कम 6 घंटे रोजाना प्रैक्टिस की
जरूरत है। खिलाड़ी शुरू से ही पढ़ाई और अन्य कामों में इतना व्यस्त हो जाता है कि
वो फुटबाल के लिए समय ही नहीं दे पाता। खिलाडिय़ों को पसीना बहाने की जरूरत है।
फुटबाल में पिछड़े रहने का एक अन्य कारण यह है कि विदेशों में तीन-चार खिलाडिय़ों पर
एक कोच होता है पर यहां ऐसा नहीं है। हमारा एक कोच 20-25 खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग
देता है जिससे वो उन पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता। यूरोप में तो हरेक प्रकार के
खिलाड़ी के लिए अलग-अलग कोच हैं जैसे मिड फिल्डर के लिए अलग, स्ट्राइकर के लिए अलग,
पर हमारे यहां एक ही कोच हर तरह के खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग देता
है।
क्लबों की है कमी : यूपी, दिल्ली में बड़े फुटबाल क्लबों
की भी कमी है जो अच्छे खिलाडिय़ों को मौका दे सकें। हमारे खिलाडिय़ों को दूसरे
राज्यों में जाना पड़ता है। दूसरे राज्यों की एकेडमियां पहले अपने खिलाडिय़ों को
मौका देना चाहती हैं बाद में अन्य को। फिर ऐसे में खिलाड़ी क्या करें। खिलाडिय़ों के
मां-बाप को भी लगता है कि फुटबाल में पैसा नहीं इसलिए वो अपने बच्चों को फुटबाल
खेलने के लिए प्रेरित ही नहीं करते । अगर फुटबाल की बड़ी एकेडमियां खुलती हैं और ये
खिलाडिय़ों को अच्छा पैसा देते हैं तो बच्चों के मां-बाप भी इस ओर ध्यान देंगे।
यूरोप, ब्राजील, इटली और दुनिया के अन्य देशों में खेल के मैदान उच्च क्वालिटी के
हैं पर हमारी सरकार तो क्रिकेट के लिए 22 गज की पिच तैयार करने में ही जुटी रहती
है, ऐसे में अगर खिलाडिय़ों को अच्छा मैदान मुहैया नहीं होगा तो उनके अभ्यास में
बाधा तो आयेगी ही।
बदलनी होगी नीति : सरकार अगर ध्यान दे तो
स्कूल स्तर पर ही फुटबाल के अच्छे खिलाड़ी तैयार किये जा सकते हैं। स्कूल स्तर पर
ही बच्चों की मानसिकता ऐसी बना दी जाती है कि वो क्रिकेट के सिवा किसी खेल को खेल
ही नहीं समझते है। स्कूलों में फुटबाल का हाल भी वैसा ही है। स्कूल में पढ़ाई का
सिस्टम भी ऐसा है कि एक बच्चे के पास पढ़ाई के बाद ज्यादा समय बचता ही नहीं कि वो
प्रैक्टिस को प्र्याप्त समय दे सके। सरकार का चाहिए की वो पढ़ाई की स्थिति में भी
सुधार करे जिससे खेल में रुचि रखने वाले बच्चों को प्रैक्टिस के लिए पर्याप्त समय
मिल सके। दुनिया के दूसरे देशों में पांच-छह साल की उम्र में ही खिलाडिय़ों को सरकार
की तरफ से खोली एकेडमियों में रखकर उन्हें सुविधाएं मुहैया करवाई जाती हैं। जिससे
17-18 साल की उम्र तक वो अच्छे खिलाड़ी बन जाते हैं। अगर यहां भी सरकार खिलाडिय़ों
को शुरू से ही सुविधाएं मुहैया करवाए जिससे उन्हें अच्छी शुरुआत मिले तो हमारे पास
भी अच्छे खिलाड़ी होंगे।
प्रतिभा की नहीं है कमी : देश में
प्रतिभा की कमी नहीं है। हमारे युवा खिलाडिय़ों में हर वो क्षमता है जो एक अच्छे
फुटबाल खिलाड़ी में होनी चाहिए। जरूरत है सिर्फ उस क्षमता को तराशने की, उन्हें सही
वक्त देने की। देश भर में हजारों ऐसे खिलाड़ी हंै जो दिन रात पसीना बहा रहे हैं और
एक दिन फुटबाल की दुनिया में भारत का प्रतिनिधित्व भी करेंगे। ये खिलाड़ी जोश से
लबरेज हैं सिर्फ इन्हें सही मार्गदर्शक की जरूरत है। फुटबाल की दुनिया में हम चमके
तो पर फुटबाल खेलने नहीं बल्कि फुटबाल बनाने में। भारत में हजारों ऐसी कंपनियां है
जो दुनिया के लिए फुटबाल बनाती हंै जिससे बाकी देशों के खिलाड़ी खेलते हैं लेकिन
हमारे देश के लगभग 70 फीसदी हिस्से को एक अदद फुटबाल भी नसीब नहीं
है।
बाकी खेलों से है सस्ता : अन्य खेलों के मुकाबले फुटबाल
काफी सस्ता खेल है। इसको खेलने के लिए ज्यादा सामान की जरूरत नहीं है जिससे खर्च भी
ज्यादा नहीं आता। भारत में सबसे ज्यादा फुटबाल कोलकाता और उत्तराखंड में खेला जाता
है। कोलकाता में तो फुटबाल की स्थिति थोड़ी ठीक है पर उत्तराखंड में स्थिति
चिंताजनक है। अगर इसे गरीबों का खेल कहें तो भी कोई गलत बात नहीं होगी क्योंकि एक
फुटबाल से 11 लोग खेल सकते हैं और उस फुटबाल की कीमत भी बहुत ज्यादा नहीं होती है।
अगर बच्चों को आर्थिक सहायता और अच्छे कोच मुहैया करवाए जाएं तो वो भी देश का नाम
रौशन कर सकते हैं।
गिने चुने नाम ही आए सामने : आईएम विजयानन,
सुनील चेतरी, महेश गावली, सनमुगम वेंकटेश-ये वो नाम है जो फुटबाल की दुनिया में तो
चमके तो पर लोगों की जुबां पर नहीं आ सके। राष्ट्रीय स्तर पर इन्होंने कई इनाम जीते
पर भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नहीं ले जा सके। फुटबाल की दुनिया में भारत के
लिए एक ही नाम बहुत चमका, वो है बाइचुंग भूटिया। बाइचूंग भूटिया फुटबाल को लोकप्रिय
बनाने के लिए आजकल जोश के साथ काम तो कर रहे हैं पर इस बात से भी मुंह नहीं मोड़ा
जा सकता है कि वो खिलाड़ी कम और सेलेब्रिटी ज्यादा हैं। भारत के खिलाडिय़ों के पास
खेलने के अतिरक्ति इतने काम होते हैं कि वो खेल को लगभग भूल ही जाते हैं। मशहूर
होने पर उसको विज्ञापन इतने मिलने शुरू हो जाते हैं कि वो उसकी शूटिंग में ही सारा
समय व्यस्त रहतें है। इससे खेल पर क्या प्रभाव पड़ता है वह सबके सामने है। सरकार को
चाहिए कि वह इस ओर भी ध्यान दे ताकि फुटबाल को हमारे देश में भी उतनी महत्ता मिले
जितनी क्रिकेट को मिल रही है।

Thursday, January 13, 2011

जितना भी पढ़े मन लगाकर पढ़ें

आईएएस की परीक्षा में 487वां रैंक हासिल कर अपने गांव भानपुर
जिला बाराबंकी का नाम रौशन करने वाले समीर पांडे से इमरान खान की बातचीत के कुछ अंश
आपको
आई.ए.एस. बनने की प्रेरणा कहां से मिली?

मैं शुरू से ही दोस्तमिजाज
रहा हूं। पढ़ाई में शुरू से ही अच्छे प्रदर्शन के बावजूद मेरा मन अपने अजीज मित्रों
के साथ मंडली बाजी में ज्यादा लगता था। दोस्तों के बीच हमेशा ही बौद्धिक और सामाजिक
विषयों पर बड़ी गरमागरम और मजेदार चर्चाएं होती थीं। लखनऊ शहर भी इस मामले में एक
जिन्दा शहर है जहां मैने देश के स्थापित प्रबुद्ध जनों को न सिर्फ देखा, सुना और
समझा बल्कि उनके साथ गम्भीर वैचारिक बहसों में भी भाग लिया। सामाजिक सक्रियता ने भी
मुझे बहुत कुछ दिया। इसकी सकारात्मक-नकारात्मक शिक्षाओं ने भी मेरी समझ को तराशने
में बड़ी भूमिका निभाई। यही वह पृष्ठिभूमि थी जिसने मुझे अध्ययन की ओर प्रेरित
किया। मेरे कुछ मित्र काफी पहले से सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे थे। लेकिन मेरा
मन साहित्य में ही ज्यादा लगता था। मै विश्वविद्यालय में शिक्षक बनना चाहता था
इसलिए शुरू में मुझे यह क्षेत्र अच्छा नहीं लगता था। लेकिन बाद में दोस्तों के जोर
देने पर मुझे भी लगा कि चलो तैयारी कर ली जाए। एमए फस्ट ईयर से ही मैंने तैयारी
शुरू कर दी थी।
ये आपका पहला अटेम्प्ट था?नहीं, ये मेरा
दूसरा अटेम्ट था। पहली बार में मैं प्री नहीं क्लीयर कर पाया था। दरअसल पहली बार जब
मैने यह इक्जाम दिया तो मैं अपने भविष्य को लेकर बड़ी उधेड़बुन में था। मुझे लगता
था जैसे मेरी पुरानी दुनिया मुझसे दूर होती जा रही है। शायद यही मुख्य वजह थी कि
मैं प्री भी क्लीयर नहीं कर पाया। मैंने लखनऊ में प्रयत्न गाइडेन्स में तैयारी की।
वहां का माहौर काफी अच्छा है। अनमोल सर ने न सिर्फ मेरी अच्छी तैयारी करवाई बल्कि
मेरी उधेड़बुन को भी हल करने में भी मेरी मदद की। इस बार मैंने पूरी मेहनत से पढ़ाई
की और दोनों क्लीयर कर लिया।
दिन में कितने घंटे पढ़ाई किया करते थे
आप?

मैं ज्यादा नहीं पढ़ता था। दिन में 6-7 घंटे ही पढ़ता था पर जितना
पढ़ता था मन लगाकर पढ़ता था। मुझे ऐसा लगता है कि इस इक्जाम के लिए सिर्फ घोंटा
लगाने से काम नहीं चलता। जितना भी पढ़ें मन लगाकर पढ़ें तो वही आपके लिए ज्यादा
मददगार होगा।
खाली समय में क्या करते थे?
साहित्य पढ़ता
था। कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि हमेशा से मुझे पसंद रहे हैं। मैं हिन्दी में
पीएचडी कर रहा हूं, तो तैयारी के बाद जो भी समय बचता था, उस समय या तो साहित्य की
किताबें पढ़ता था, अपनी पीएचडी पर काम करता था या फिर अपने परिवार और दोस्तों के
बीच समय बिताता था।
आगे के लिए आपने क्या चुना है?
मैंने
आईआरएस को चुना है। अब देखते हैं कौन सा विभाग मिलता है।
आईएएस पास करने
के बाद जब गांव पहुंचे तो कैसा महसूस हुआ?

परीक्षा परिणाम आने के बाद
मैं लखनऊ से अपने गांव पहुंचा। मुझे यह नहीं पता था कि गांव वाले रास्ते में मेरा
इन्तजार कर रहे हैं। ज्यों ही मैं अपने गांव के पास बस से उतरा तो देखा कि मेरे
गांव के करीब 150 लोग गांव के पास की सड़क पर फूल, माला और मिठाइयां लिए मेरा
इन्तजार कर रहे हैं। मेरे बस से उतरते ही मुझे सबसे पहले बधाई देने के लिए सभी में
होड़ सी मच गयी। गांव वालों का प्यार देखकर मेरा मन उनके प्रति कृतज्ञता से भर गया।
हमारे गांव में साक्षरता दर बहुत कम है इसलिए गांव वालों की खुशी का कोई ठिकाना
नहीं था। वे लोग अपने रोज-रोज के झगड़े भूलकर आज खुश थे। यह देखकर मैं जोर से हंस
पड़ा।
अब आपकी साहित्यक अभिरुचि पर असर नहीं पड़ेगा?
नहीं
ऐसा नहीं है। जरूरी नहीं है कि अध्यापक ही साहित्य पर काम करें। हम किसी भी फील्ड
में रहकर साहित्य पर काम कर सकते हैं। मुझे तो कम से कम यही लगता है। मैं तो यही
चाहूंगा कि खुदा करे आपकी बात झूठी साबित हो जाए।
आईएएस की तैयारी के
लिए कोचिंग इंस्टीट्यूट से जुडऩा जरुरी है?

देखिए, अगर आप मजबूत इरादे
के साथ मन लगाकर तैयारी करें तो आपको किसी कोचिंग की जरूरत नहीं है। आप बिना कोचिंग
इंस्टीट्यूट से जुड़े भी तैयारी कर सकते हैं। पर अक्सर ऐसा होता है कि कई पहलुओं पर
हम सोच ही नहीं पाते और वहीं एग्जाम में आ जाते हैं। कोचिंग इंस्टीट्यूट में जो
अध्यापक कोचिंग देते हैं उन्हें तमाम विषयों पर अच्छी जानकारी होती है। महंगे
कोचिंग इंस्टीट्यूट ज्वाइन करने के बजाय अच्छे कोचिंग इंस्टीट्यूट से जुडऩा चाहिए।
सीधे किसी इंस्टीट्यूट को ज्वाइन करने के बजाय दो-तीन दिन वहां पढ़कर देखना
चाहिए।
जो युवा आईएएस करने की सोच रहे हैं उन्हें क्या कहना चाहेंगे?
यही कहूंगा कि मन लगाकर पढ़ें। अखबार, मैगजीन और न्यूज चैनल ध्यान से
देखें। करंट अफेयर्स पर विशेष ध्यान रखें क्योंकि जनरल स्टडी में ज्यादातर सवाल इसे
विषय से लिए जाते हैं। और सबसे अहम बात जिन्हें जल्दी-जल्दी धन का महल खड़ा करनी की
चिन्ता हो वे इस क्षेत्र में न आयें तो बड़ी मेहरबानी होगी। जनता के प्रति सेवाभाव
रखने वालों को ही इस क्षेत्र में आना चाहिए।

Tuesday, January 11, 2011

                                           दिल्ली किनारे यमुना

लोग जब दिल्ली में बसना शुरू किया था तो यमुना से उनको बहुत फायदा होता था. कई लोग तो उसे यमुना माता कह के बुलाते थे. यमुना नदी के होने से दिल्ली में परवहन के साधन सुलभ हो गया था. इन सब के साथ  साथ जो सबसे बड़ी फायदा होता था वो था की पूरी दिली को इससे साफ़  पानी मिलता था. लेकिन जैसे जैसे दिल्ली में लोगों की भीड़ बढ़ने लगी वैसे वैसे यमुना गन्दा होता गया. दिल्ली शहर की जितनी भी गन्दगी है वो नालों के जरिये यमुना में बहा दिया जाता है जिसके कारण यमुना नदी कम एक नाला ज्यादा लगती है. दिल्ली सरकार तथा दिल्ली के लोगन का इस ओर कोई खास ध्यान  भी नहीं जाता. एक ज़माने में जिस नदी के पानी को पवित्र मन जाता था अज वही यमुना इतनी मैली हो चुकी है की लोग उसके बगल भी नहीं जाना चाहते.          
                                  हज़रात निजामुद्दीन की दरगाह सरीफ

कहा जाता है की दिल्ली में हज़रात निजामुद्दीन का साया है तथा दिल्ली वालों हजरत का खास करम है. सालों पहले हजरत निजामुद्दीन जब दिल्ली ए तो उन्होंने निजामुद्दीन में ही अपना बसेरा किया. कुछ ही दिनों में उनकी नेक बख्ति का चर्चा इतना मशहूर हो गया की वह की बादशाह को लगा अब उसकी गद्दी छीन जाएगी. एक दिन बादशाह उसके पास पहुंचा और कहा की तुझे जियनी दौलत चाहिए तुम लेलो लेकिन यहाँ से चले जाओ. उस समय हजरत नमाज़ अदा करके अपनी जानमाज़ पर ही बेठे थे उन्होंने अपना जानमाज़ का कोना उठाया और बादशाह से कहा के इधर देखो बादशाह ने देखा के वहां हीरे तथा जवाहरातों की ढेर लगी है.
अज भी उनका दरगाह सरीफ निजामुद्दीन में मौजूद है जहा हर रोज़ हजारो लाखो लोग जियारत को आते है और वहां से माला माल होके जाते है.                                   
                                                 पुराणी दिल्ली

दिल्ली दुनिया की प्राचीन शहरों में से एक है. यमुना नदी के किनारे बसा हुआ ये शहर अपने आप में एक अनोखी शहर है. मुग़ल शाशक से ले कर अँगरेज़ सभी ने इसको अपना केंद्र बिंदु रखा. मुघलों द्वारा बनाये गए लाल किला जामा मस्जिद तथा अन्य  स्मारक अज भी दिल्ली की शोभा को बढ़ाती है.जिस प्रकार दुनिया भर में दिल्ली अपने अनूठेपन के लिए जानी जाती है उसी प्रकार पुरानी दिल्ली खास कर जामा मस्जिद और चांदनी चौक का इलाका अपने अनूठेपन के लिए जाना जाता है. अगर अप घुमने के मकसद से चांदनी चौक जाते है. तो वहां की पराठे वाली गली में जाना मत भूलयेगा. चांदनी चौक की पराठे वाले गली और आस पास की दुकानों में जो पकवान पकती है वो देश तथा दुनिया भर से ए शैलानुयों को बिना लुभाए नहीं रहती.

Saturday, January 8, 2011

                                              ऑटो रिक्शा वाले की मनमानी

दिल्ली में ऑटो रिक्शा एक आम सवारी के रूप में प्रयोग किया जाता है. जो लोग थोड़े पैसा वाले होते हैं तथा कामकाजी होते हैं वो ऑटो से ही कहीं जाना आना पसंद करता है.ऑटो रिक्शा वाले भी इस मौके का फायदा खूब उठाता है. वो सवारियों से मनमाने ढंग से पैसे लेता है जिन लोगो पता होता है या जो चालाक होते है उनको तो वो ठग नहीं पते लेकिन जो लोग कहीं बाहर से आते हैं उनको तो वे खूब ठगता है. अगर उन्हें मीटर से चलने को कहो तो वो चलने को तैयार ही नहीं होता. और अगर रात का मामला हो तो वे और ज्यादा मनमानी करते हैं. दुगना या तीनगुना पैसा देने पर चलने को तैयार होता है. अगर रात में कोई महिला सवारी मिले तो वो बदतमीज़ी भी कर सकता है. अभी हाल ही में एक कॉल सेंटर में काम करने वाली महिला के साथ चार ऑटो चालको ने मिल कर रपे किया. बाहर से आने वाली लड़कियों का मानना है की दिली में वे सुरक्षित महसूस नहीं करते.                 

Friday, January 7, 2011

                                                     कुत्ता भी एक समस्या

दिल्ली में वेसे आपको दुनिया की साडी सुविधा मिल जाएगी हर किस्म के लोग अनेक किस्म के पकवान रंग बिरंगे आधुनिक कपडे जो की दिल्ली और दिल्ली की लोगों की शोभा बढ़ाते हैं.लेकिन दिल्ली में एक समस्या है और वो है जंगली कुत्ता जो की दिल्ली के सड़कों पे आवारा घूमते हैं जिससे लोगों को खासी परेशानी होती है अभी हाल ही में जब कॉमन वेल्थ गेम हुआ तो दिल्ली के सरे आवारा कुत्तों को पकड़ के बंद कर दिया गया. पुरे दिल्ली में लगभग १६०० कुत्तों को पकड़ा गया.
खैर जो भी हो लेकिन कान वेल्थ के ख़त्म होते ही दिल्ली में फिर से ये कुत्ते घुमने लगे हैं. जिससे लोगों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ता है.जो भी हो ये समस्या तो फ़िलहाल ख़त्म नहीं होने वाला है अभी लोगों को इस समस्या से जूझना ही पड़ेगा. 
                                                     अवैध निर्माण

दिल्ली भारत की राजधानी है. राजधानी होने के नाते यहाँ की शाशन व्येस्था दुसरे राज्यों से भिन्न है. यहाँ की लाइफ स्टाइल भी थोड़े भीं है. दिल्ली में डी डी ऐ फ्लेट्स ने अपनी धग जमा राखी है. एक ओर जहा डी डी ऐ फ्लेट्स तथा अन्य बिल्डर्स ने वेध निर्माण किये है और दिल्ली को एक शहरी व्यस्था में ढाला है वहीँ दूसरी  ओर दिल्ली में अवेध निर्माण की भी कमी नहीं है. ये जितने भी अवेध निर्माण होते है वो ज्यादातर पब्लिक प्रोपर्टी होता है जो लोप्गो को किराये पे दिए जाते हैं.एक ही बिल्डिंग पे बहुत ज्यादा लोग रहते हैं जिसका ये नतीजा होता है की वह गंदगी फैलती है और बिल्डिंग भी जल्दी ख़राब हो जाता है,कमजोर हो जाता है. अभी हाल ही में एक बिल्डिंग के गिर जाने से सेकड़ों लोग जन से हाथ धो बैठे. दिल्ली सरकार को इन सब चीजों पर ध्यान देना चाहिए.              

Wednesday, January 5, 2011

                                                दिल्ली में ट्राफिक समस्या

दिल्ली में जितनी सड़के हैं उतनी ही गाड़ी है और उतनी ही ट्राफिक समस्या उत्पन्न होती है| अमेरिका के  बाद सबसे ज्यादा वाहनों की संख्या भारत में ही है| लेकिन ट्राफिक रुल बहुत कम फोल्लो करते हैं जिनकी वजह से जम लग जाती है और घंटो लोग इसमें फंसे रहते हैं| ट्राफिक पुलिस के लाखो कोशिशों के बावजूद सड़कों पे लम्बी लम्बी जाम लग जाती है| कामों वेल्थ खेलो  के दौरान यहाँ कुछ सुधार लेन की कोशिश की गयी लेकिन उसका भी कोई फायदा नज़र नहीं आया| एक तरफ तो दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाया जा रहा है वही दूसरी तरफ अपने ही बुने जाल में घंटो फंस जाते हैं|
अगर दिल्ली सरकार को इससे निजात पाना है तो सख्त से सख्त रुल बनाना होगा तथा दिल्ली के लोगों को भी इसमें अहम् भूमिका निभानी होगी|  
                                                        दिल्ली की सड़कें

    दिल्ली को अगर गौर से देखा जाये तो इसमें ईमारत और सड़के नज़र आयेंगी| दिल्ली में इतनी सड़के हैं की हास्यकर इन सडको के साथ कॉमेडी करने लग जाता है| लेकिन दुःख की बात है की इतनी सड़के होते हुए भी दिल्ली ट्राफ्फिक समस्या बढती जा रही है| इनके साथ साथ दिल्ली की सडको की दशा भी इतनी बुडी है की लोग उस में अपने वाहन के साथ हिचकोले खाते नज़र आते है| आम मोसम तो तब भी गुज़ारा लायेक होता है लेकिन जब मोसम बरसात की आती है तो दिल्ली की सड़कों की हालत खस्ती हो जाती है| जगह पानी लग जाता है और उसके साथ जो गड्ढे होते होते हैं वो और भी बड़े हो जाते हैं| दिल्ली सरकार की ध्यान भी इस ओर ज्यादा नहीं जाता जबकि सभी न्यूज़ चेनल वाले यही दिखाते हैं| खेर कॉमन वेल्थ खेलों के साथ इस तरफ थोडा सुधर आया है| 
                                                               परम्परागत सवारी रिक्शा

यूँ तो दिल्ली एक  महानगर है और आधुनिक दुन्य के साथ कदम से कदम मिला के चल रही है| दिल्ली में जहा एक ओर मेट्रो रेल जैसी सुविधा लोगो के लिए मोजूद हैं वही दूसरी ओर रिक्शा भी दिल्ली की सडको पर पर चलती दिखती है| कुछ लोग तो इसे बहुत बुदा मानते हैं उनके अनुसार दिल्ली अज एक आधुनिक शहर है लेकिन अज भी दिल्ली में रिक्शा चालको की भीड़ लगी रहती है और ये हमारी शान के खिलाफ बात है| लेकिन इस सिलसिले में मेरा व्येक्तिगत  विचार है की दिल्ली को रिक्शा बदनाम नहीं कर रही बल्कि इसी बहाने दिल्ली की असली पहचान बाकि है दिल्ली में जहा एक ओर मेट्रो रेल दौडती है और दिल्ली की अधिनिक्ति की पहचान वही दूसरी ओर रिक्शा असली दिल्ली की पहचान है|

Monday, January 3, 2011

विरोध में छात्र सड़क पर ..


पॉलिटेक्निक महाविद्यालय के सैकड़ों
विद्यार्थी बस संचालकों द्वारा अभद्र व्यवहार करने और बस नहीं रोकने से परेशान होकर
शुक्रवार को सड़क पर आ गए। गुस्साए विद्यार्थियों ने दोपहर 12.30 बजे सड़क पर
चक्काजाम कर दिया। बाद में पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभाला और
विद्यार्थियों को समझाइश दी। इसके बाद विद्यार्थी रोड से हटे और यातायात बहाल हुआ।
इस दौरान करीब 25 से 30 मिनट तक यातायात रूका रहा।
शुक्रवार को अंजड़ रोड
करी गांव के समीप स्थित शासकीय पॉलिटेक्निक महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने बस
संचालकों द्वारा बस न रोकने और विद्यार्थियों से अभद्र व्यवहार को लेकर चक्काजाम कर
दिया। इसकी जानकारी मिलते ही बड़वानी थाना के एएसआई कमलसिंह पंवार मौके पर पहुंचे
और विद्यार्थियों को समझाइश दी।
इसकी जानकारी मिलने पर बड़वानी थाना
प्रभारी अजय संगर भी कॉलेज में पहुंचे। विद्यार्थियों ने बताया कि बर्मन बस के
ड्राइवर ने गुरूवार दोपहर 12.30 बजे हमें बस से उतार दिया। इस कारण हम अपराह्न 4
बजे तक कॉलेज गेट के सामने खडे रहे। किसी भी बस वालों ने हमें बस में नहीं बैठाया।
विद्यार्थियों का कहना था कि आए दिन बस संचालक इसी प्रकार का व्यवहार करते हैं। साथ
ही गाल-गलौज भी करते हैं।
परीक्षा के समय ज्यादा परेशानी
विद्यार्थियों
के अनुसार परीक्षाओं का दौर चल रहा है और बस संचालकों की मनमानी से हम परेशान हो गए
तब जाकर यह कदम उठाया। विद्यार्थियों ने बताया कि हमारी परीक्षाएं सुबह 8 बजे से
प्रारंभ हो जाती है। ऎसे में बस नहीं मिलने से हम ज्यादा परेशान होते हैं। कॉलेज के
सामने बस स्टॉप पर घंटों इंतजार करने के बाद कोई बस रूकती है।
थाना प्रभारी
ने समझाया
बड़वानी थाना प्रभारी अजय संगर ने विद्यार्थियों का कहा कि इस प्रकार
की कोई भी घटना आप लोगों के साथ हो तो पहले आप हमें सूचित करें। हम आप लोगों की
समस्या समझते है। आप पढ़ाई में ध्यान दें। उन्होने विद्यार्थियों से कहा कि हम बस
संचालकों के विरूद्ध कार्रवाई करेंगे।
नहीं देते किराए में
छूट
पॉलिटेक्निक कॉलेज के प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों मनीष मुजाल्दे, सौरभ
बड़ौले, मनोज धाकड़, संजय यादव, ने बताया कि आए दिन छात्रों के साथ बस संचालक
दुर्व्यवहार करते हैं। हमें बस में नहीं बैठाया जाता। छात्र तेजपाल सोलंकी, मुकेश
शर्मा, महेन्द्र ततवारे विवेक त्रिपाठी ने बताया की बसों में विद्यार्थियों को
किराए में छुट भी नहीं दी जाती है। हम लोगों से पूरा किराया वसूला जाता है।
प्राचार्य बैठे रहे कैबिन में
प्राचार्य एम मुंशी इस पूरे मामले के
दौरान अपने कैबिन से बाहर ही नहीं निकले। विद्यार्थियों की समस्या की ओर प्राचार्य
ने कोई ध्यान नहीं दिया। विद्यार्थी समस्या को लेकर रोड पर चक्काजाम कर रहे थे और
प्राचार्य अपने कैबिन में आराम फरमा रहे थे।
आरटीओ को पत्र लिखा है
इस
समस्या के लिए हमने आरटीओ को पत्र लिखा है। साथ ही बस एसोसिएशन वालों से भी बात कर
रहे हैं। विद्यार्थियों के लिए कॉलेज बस स्टॉप पर विधायक निधि से यात्री
प्रतिक्षालय भी बनने वाला है।